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Thursday, February 18, 2016

अपने सम्भावनापूर्ण छात्रों की रक्षा कीजिये देशवासियों!
--शीबा असलम फ़हमी 

एबीवीपी के गुंडों ने कुछ साल पहले प्रोफेसर एच.एस. सभरवाल का दिन दहाड़े, पीट-पीट के क़त्ल कर दिया था, कैंपस ही में. तीन साल बाद (2009 में) मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने सभी छः के छः हत्यारों को क़ानूनी दांवपेंच के ज़रिये बाइज़्ज़त बरी करवा दिया. हालाँकि प्रो सभरवाल के क़त्ल की प्रक्रिया को पूरे देश ने टीवी पर देखा था लेकिन सभी गवाह पलट गए, पुलिस ने क़ातिलों को सजा दिलवाने के बजाय उन्हें बचाने वाली जांच की और नतीजा ये की सभरवाल परिवार ने अपने पिता के साथ-साथ न्याय की हत्या का अतिरिक्त शोक मनाया तीन साल बाद दोबारा. हालाँकि जज ने इन्साफ की हत्या होते देख कुंठित हो अपने फैसले में ये लिख दिया है की 'ये आरोपी दोषी तो हैं, लेकिन गवाहों के पलट जाने और अभियोग पक्ष के निकम्मेपन के कारण छूट रहे हैं'.
 
प्रो सभरवाल को मारने के बाद, 2015 में एबीवीपी के 'विद्यार्थियों' ने कैंपस में क़त्ल करने के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए हैदराबाद यूनिवर्सिटी में दलित स्कॉलर रोहित वेमुळे को झूठे क्रिमिनल केस में फंसा कर यूनिवर्सिटी से निकलवा दिया, उस पर अफज़ल गुरु-याक़ूब मेमन के समर्थन का आरोप लगाया- उन मरे हुए दो लोगों के 'समर्थन' को 'देशद्रोह' के तौर पर व्याख्यित किया (हालाँकि अब उन दोनों का कोई कितना भी समर्थन करे वो दोनों तो फांसी पर झूल चुके है) रोहित की स्कालरशिप बंद करवाई जिसके भरोसे वो ग़रीब माँ का बेटा चाँद-सितारे छूने निकला था और अंततः उसका रौशन करियर बर्बाद कर दिया. संभावनाओं से भरपूर उस दलित नौजवान को एबीवीपी के अध्यक्ष सुशील कुमार ने नितांत झूठे केस में फंसा कर फ़ुटपाथ पर पहुंचा दिया, जिससे जूझते हुए वो ख़ुदकुशी के लिए मजबूर हो गया. जाते-जाते रोहित को इसके लिए भी माफ़ी मांगनी पड़ी की वो आत्महत्या करने के लिए एक दोस्त का कमरा इस्तेमाल कर रहा है, क्यूंकि रोहित तो महीनो से फूटपाथ पर जिंदिगी गुज़ार रहा था, उसके पास अपने कमरे में आत्मसम्मान के साथ आत्महत्या करने की सुविधा नहीं थी. कहाँ तो वो साइंस का मेघावी छात्र था और कहाँ वो बर्बाद हो कर क़र्ज़ में डूबा हुआ पराजित! इस हत्या में एबीवीपी को वाइस चांसलर, यूनिवर्सिटी प्रशासन, राज्य मंत्री दत्तात्रेय से लेकर केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी तक का भरपूर समर्थन मिला (डिटेल्स तो आप सब जानते ही हैं)।

अब उनके निशाने पर जेएनयू के 20-25 छात्र हैं. छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों के लिए ये गिरोह मॉब-लिंचिंग का माहौल तैयार कर रहा है. क़ानून अपना काम करे तो किसी को भी ऐतराज़ नहीं लेकिन तीन दिन से पटियाला कोर्ट में चल रही अराजकता से ज़ाहिर है की इरादा कुछ और है. इस काम में इन्होने संघ-परिवार के कई और तबकों को भी शामिल कर लिया है. कॉर्पोरेट मीडिया क्यूंकि उन्ही मालिकों का है, जिसकी लूट पर जेएनयू में सबसे कड़ा विरोध है, इसलिए ये मीडिया हाउस इस बार तो एबीवीपी के सहज पार्टनर हैं ही. वरना इसी बार 20-25 छात्रों के मामूली से एक कार्यक्रम को कवर करने कॉर्पोरेट मीडिया जेएनयू में कैसे उपस्थित था, जोकि प्रेसिडेंशियल डिबेट तक में नहीं आता? 
पता नहीं हमसब मिलकर भी इन नौजवानो को बचा पाएंगे या नहीं, लेकिन हम स्क्रिप्ट तो ठीक-ठीक पढ़ पा रहे हैं इस बार. 

देश को इस गिरोह से होशियार रहना चाहिए क्यूंकि ये पहले साज़िश रचते हैं, फिर अपने मीडिया की मदद से घेरते हैं, और क़ानून हाथ में लेकर काम अंजाम देते हैं. इस बीच इनका मीडिया इनके पक्ष में माहौल गरमाए रखता है ताकि इनका अपराध स्वाभाविक प्रतिक्रिया लगे. एबीवीपी अपराध में सीनाजोरी के मामले में अब विश्व हिन्दू परिषद को टक्कर दे रही है. ये लोग अपनी अपराध-कला में पारंगत हो चले हैं, ये देखभाल के वहीँ शिकार करते हैं जहाँ इन्हें अपनी भाजपा सरकार के साथ का भरोसा प्राप्त हो. 
देश को अपने सम्भावनापूर्ण छात्रों को इनसे बचाने का रास्ता जल्द ढूंढना होगा.

-- शीबा असलम फ़हमी 
शोधार्थी,
जे एन यू 

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