There was an error in this gadget

Sunday, November 1, 2015

मुनादी से महानाद तक! 

--शीबा असलम फ़हमी 

किसने सोचा था की सहारा ढूंढने की उम्र वाले कलमकार सवा सौ करोड़ अवाम वाले इस नौजवान देश का इतना मज़बूत सहारा बनेंगे? शशदर हम जब नाउम्मीदी के दलदल में बेरोक धंस रहे थे, जब जंतर-मंतर में हमारे गले सूख गए थे, जब हुकूमत से शह पाये हत्यारे-गिरोह इस मिटटी के कालबुर्गी की दोनों आँखों के बीच नली रख दाग़ रहे थे, जब सत्ता के अभयदान प्राप्त हमारे दाभोल्करों को सुबह सवेरे गोली मार रहे थे, जब किसी भी बेचारे को घर-बिस्तर से खींच कर कुचल कुचल के मारा जा रहा था, और ऐलान हो रहा था की मौत का ये नंगा नाच जारी रहेगा, जब सीनाजोरी सबसे निर्लज्ज अवस्था में आँख में आँख डाले खड़ी थी, जब अँधेरा सबसे ज़्यादा घना हो चला था, तभी अवाम के कलमकारों ने उम्मीद की डोर थाम ली। 2010 में 'साहित्य और मीडिया' पर अविनाश दास द्वारा मोहल्ला डॉट कॉम के मंच से आयोजित 'बहसतलब' गोष्ठी में हिंदी साहित्यकार राजेंद्र यादव ने कहा था की 'साहित्यकार बेहतर प्रवक्ता हो सकते हैं समाज के'. आज साहित्यकार प्रवक्ता से आगे जा कर कर्णधार हो गए इस गरु दौर के. अश्लील पूँजी का ये कैसा घना कुहासा था की अर्थतंत्र की धुरी पर घूमती दुनिया की कान पर जूं नहीं रेंग रही थी, विदेशों में बसे इंसाफ़पसन्द भारतीय हर बार अपना विरोध दर्ज कर रहे थे, भारत के पीड़ित और इंसाफ़पसन्द हर वैकल्पिक मंच पर गुहार लगा रहे थे. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में दुनिया की सबसे ग़रीब अवाम के बीच, दुनिया के सबसे अमीर भी बस्ते हैं लेकिन पूँजी के इन शहंशाहों को सिर्फ अपनी लूट से मतलब है- उन्होंने हर मीडिया-मंच खरीद लिया है, इस तरह वो दुनिया को भरमा कर खुश हैं की बात दबी रह जाएगी, कि तभी हिंदी के हरदिल अज़ीज़ लेखक उदय प्रकाश ने एक ऐसी मुनादी लगा दी जो देखते ही देखते महानाद में बदल गयी. उदय प्रकाश पर आरोप रहा है की कुछ साल पहले उन्होंने गोरखपुर के विवादास्पद योगी अदित्यानाथ जैसे हिंदुत्वा और साम्प्रदायिकता के प्रतीक पुरुष से सम्मान ले लिया था, इस लिहाज़ से ये सबसे मुनासिब भी था की उदय प्रकाश ही हिंदुत्वा के भस्मासुर पर पहला वार करें. १२ सितम्बर को उन्होंने साहित्य अकादमी द्वारा दिया गया पुरस्कार, शाल, 100,000 /- नक़द और ताम्रपत्र अकादमी को वापिस लौटा दिया ये कहते हुए की अकादमी द्वारा सम्मानित कन्नड़ साहित्य के लेखक एम एम कालबुर्गी की नृशंस हत्या और अन्य लेखकों पर हमलों पर साहित्य अकादमी बेशर्मी से खामोश है. शुरुआत में वही हुआ जिसके लिए हिंदी साहित्य की दुनिया जानी जाती है, नैतिकता के सवाल यहाँ बहुत अखरते हैं, यानी सरकार से उम्मीद लगाये बैठे मठाधीश तिलमिला गए, सोशल मीडिया पर उनके चाकर अपनी सारी मेधा झोंक के उपहास उड़ाने आ गये. लेकिन जो क़दम इतिहास की ज़रुरत होता है, अगर वो ले लिया जाये तो इतिहास बना देता है. उदय प्रकाश के बाद मशहूर और बेख़ौफ़ लेखक नयनतारा सहगल, जिन्होंने इंदिरा गांधी का इमरजेंसी के दौरान विरोध किया था, ने अपना अकादमी अवार्ड वापिस कर दिया और देखते ही देखते देश भर के 41 बड़े लेखक, रंगकर्मी, बुद्धिजीवी इस कारवां में जुड़ गये. यानी इस नाज़ुक लम्हे में कश्मीर से केरल तक भारत का दिल और दिमाग़ एक जुट है। देश की अब तक की सबसे संवेदनहीन सरकार जिसके कृषि मंत्री कहते हैं की किसान नाकाम-इश्क़ और नाकाम-सेक्स के कारण आत्महत्या कर रहे हैं, जिसकी वरिष्ठ मंत्री देश के संविधान के बजाय अपने धर्म की किताब को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करती हैं, जिसके मंत्री मीडिया को वैश्या जैसा बिकाऊ बता कर नामकरण करते हैं 'प्रेस्टीट्यूट', जिसके नेता विपक्ष को 'हरामज़ादे' कहते हैं, जिसके मंत्री संविधान को धता बता कर भारत को एक धार्मिक राष्ट्र मानते हों, और जिसके मंत्री बात-बात पर पाकिस्तान चले जाने का हांका लगते हों , और अवाम इस सब को अवाक बर्दाश्त कर रही हो, उस मजबूर दौर में अपने होने को सार्थक करते ये बुद्धिजीवी अपने त्याग और दुस्साहस के लिए उस सूची में दर्ज रहेंगे जिसमे प्रतिरोध का इतिहास जगमगाएगा.

Saturday, October 31, 2015

कैसा होगा इनका भारत!


कभी कभी मेरे मन में ख्याल आता है की कैसा होगा इनका भारत?
क्या उसमे ताज महल, मकबरे, मीनारें, इमाम बाड़े होंगे?
क्या उसमे मुग़ल गार्डन, निशात बाग़, शालीमार बाग़ होंगे?
क्या नर्गिस, गुल हिना, इत्र, गुलाब, तब भी महका करेंगे?
क्या तब भी शेरवानी, अचकन, गरारे-शरारे लहराया करेंगे?
क्या तब भी झूमर-झुमके गुलूबंद-शौक़बंद के लश्कारे दमकेंगे?
क्या तब भी बिरयानी-पुलाव, मुतनजन-क़ोरमे, कबाब-शीरमाल, वाज़वान से दस्तरख्वान आरास्ता होंगे?
क्या तब भी कोहेनूर, मुग़लेआज़म, लैला-मजनू, मियां मक़बूल, पाकीज़ा परदे का मुंह देखेंगी?
क्या तब भी शहज़ादा सलीम, अनारकली, साहेब जान, उमराओ जान की सरकशी के क़िस्से आम होंगे?
क्या तब भी बड़े ग़ुलाम अली, बेगम अख़्तर, मो रफ़ी, ए.आर.रहमान की सदाएं दिलों में उतरा करेंगी?
क्या तब भी मीर-अमीर-दबीर, ग़ालिब-जालिब, लुधयानवी-जलन्धरी के नग़मे गूंजा करेंगे?
क्या तब भी मुरादाबादी नक़्क़ाशी, फ़िरोज़ाबादी क़ुमक़ुमे, कश्मीरी ग़लीचे, नस्तालीक ख़ुश-ख़ती से अशोका-हॉल रौशन होगा?
क्या तब जी टी रोड, उसकी कोस-मीनारें, उसके मुसाफ़िर खाने, वली दकनी के मज़ार की तरह ज़मींदोज़ कर दिए जाएंगे?
ख़ाली-ख़ाली रीता-रीता, सूना-सूना फीका-फीका, आधा-अधूरा ग़रीब-गुरबा, क्या ऐसा होगा इनका भारत?
---शीबा असलम फ़हमी 






Saturday, October 17, 2015

मुनादी से महानाद तक!
--शीबा असलम फ़हमी 


किसने सोचा था की सहारा ढूंढने की उम्र वाले कलमकार सवा सौ करोड़ अवाम वाले इस नौजवान देश का इतना मज़बूत सहारा बनेंगे? शशदर हम जब नाउम्मीदी के दलदल में बेरोक धंस रहे थे, जब जंतर-मंतर में हमारे गले सूख गए थे, जब हुकूमत से शह पाये हत्यारे-गिरोह इस मिटटी के कालबुर्गी की दोनों आँखों के बीच नली रख दाग़ रहे थे, जब सत्ता के अभयदान प्राप्त हमारे दाभोल्करों को सुबह सवेरे गोली मार रहे थे, जब किसी भी बेचारे को घर-बिस्तर से खींच कर कुचल कुचल के मारा जा रहा था, और ऐलान हो रहा था की मौत का ये नंगा नाच जारी रहेगा, जब सीनाजोरी सबसे निर्लज्ज अवस्था में आँख में आँख डाले खड़ी थी, जब अँधेरा सबसे ज़्यादा घना हो चला था, तभी अवाम के कलमकारों ने उम्मीद की डोर थाम ली। 2010 में 'साहित्य और मीडिया' पर अविनाश दास द्वारा मोहल्ला डॉट कॉम के मंच से आयोजित 'बहसतलब' गोष्ठी में हिंदी साहित्यकार राजेंद्र यादव ने कहा था की 'साहित्यकार बेहतर प्रवक्ता हो सकते हैं समाज के'. आज साहित्यकार प्रवक्ता से आगे जा कर कर्णधार हो गए इस गरु दौर के. यक़ीनन ये 1975 की इमरजेंसी से कहीं ज़्यादा भयावह दौर है, उस घोषित इमरजेंसी में कम से कम सत्ता सामने से वार कर रही थी, लेकिन इस दुरूहकाल का तो कहना ही क्या जब अनेक हत्यारे-गिरोह संस्कृति रक्षा के नाम पर छुट्टे छोड़ दिए गए हैं, जो संविधान और क़ानून से ऊपर का दर्ज रखते हैं.
 
अश्लील पूँजी का ये कैसा घना कुहासा था की अर्थतंत्र की धुरी पर घूमती दुनिया की कान पर जूं नहीं रेंग रही थी, विदेशों में बसे इंसाफ़पसन्द भारतीय हर बार अपना विरोध दर्ज कर रहे थे, भारत के पीड़ित और इंसाफ़पसन्द हर वैकल्पिक मंच पर गुहार लगा रहे थे. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में दुनिया की सबसे ग़रीब अवाम के बीच, दुनिया के सबसे अमीर भी बस्ते हैं लेकिन पूँजी के इन शहंशाहों को सिर्फ अपनी लूट से मतलब है- उन्होंने हर मीडिया-मंच खरीद लिया है, इस तरह वो दुनिया को भरमा कर खुश हैं की बात दबी रह जाएगी, कि तभी हिंदी के हरदिल अज़ीज़ लेखक उदय प्रकाश ने एक ऐसी मुनादी लगा दी जो देखते ही देखते महानाद में बदल गयी. उदय प्रकाश पर आरोप रहा है की कुछ साल पहले उन्होंने गोरखपुर के विवादास्पद योगी अदित्यानाथ जैसे हिंदुत्वा और साम्प्रदायिकता के प्रतीक पुरुष से सम्मान ले लिया था, इस लिहाज़ से ये सबसे मुनासिब भी था की उदय प्रकाश ही हिंदुत्वा के भस्मासुर पर पहला वार करें. 12 सितम्बर को उन्होंने साहित्य अकादमी द्वारा दिया गया पुरस्कार, शाल, 100,000 /- नक़द और ताम्रपत्र अकादमी को वापिस लौटा दिया ये कहते हुए की अकादमी द्वारा सम्मानित कन्नड़ साहित्य के लेखक एम एम कालबुर्गी की नृशंस हत्या और अन्य लेखकों पर हमलों पर साहित्य अकादमी बेशर्मी से खामोश है.  
शुरुआत में वही हुआ जिसके लिए हिंदी साहित्य की दुनिया जानी जाती है, नैतिकता के सवाल यहाँ बहुत अखरते हैं, यानी सरकार से उम्मीद लगाये बैठे मठाधीश तिलमिला गए, सोशल मीडिया पर उनके चाकर अपनी सारी मेधा झोंक के उपहास उड़ाने आ गये. लेकिन जो क़दम इतिहास की ज़रुरत होता है, अगर वो ले लिया जाये तो इतिहास बना देता है.

उदय प्रकाश के बाद मशहूर और बेख़ौफ़ लेखक नयनतारा सहगल, जिन्होंने इंदिरा गांधी का इमरजेंसी के दौरान विरोध किया था, ने अपना अकादमी अवार्ड वापिस कर दिया और देखते ही देखते देश भर के 43 (ये लेख लिखे जाने तक) बड़े लेखक, रंगकर्मी, बुद्धिजीवी इस कारवां में जुड़ गये. यानी इस नाज़ुक लम्हे में कश्मीर से केरल तक भारत का दिल और दिमाग़ एक जुट है। लेकिन देखने की बात है की नैतिकता की बात उन्हें सबसे ज़्यादा अखर रही है जो मौजूदा व्यवस्था के साथ अनुकूलन कर चुके हैं, ऐसे मठाधीश अपने सबसे छिछले तर्कों से वार कर रहे हैं कि 'एमर्जेन्सी में क्यों नहीं किया? 1984 में क्यों नहीं किया? गोधरा पर क्यों नहीं बोले? मुज़फ्फरनगर पर क्यों नहीं बोले? कोई और रास्ता क्यों नहीं अपनाया?', 
अरे, कोई इन चाटुकारों से पूछे की ख़ुद आपने तब-तब क्या किया था जब-जब का आप ज़िक्र कर रहे हैं? दुसरे ये कि इन्हे कोई ऐसा 'चिर-विद्रोही' चाहिए जिसने हर घटना पर साहित्य अकादेमी सम्मान वापिस किया हो, जो कभी कोई मौक़ा चूका न हो विरोध करने का, वही पात्रता रखता है आज की हत्याओं के विरोध में साहित्य अकादेमी का सम्मान लौटाने की। 
 
सरकार के कर्णधारों को जिन हत्याओं पर मुखर हो सन्देश देना था, अपराध के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही करनी थी, वोही अपनी दक्षिणपंथी विचारधारा से जन्मे अंडे-बच्चों को हौसला देते रहे, बल्कि उन्होंने लेखकों के ख़िलाफ़ खड़ा होना तय किया? ये कैसी अश्लील धृष्टता है की विश्व् हिन्दू परिषद, श्री राम सेने, हिन्दू महासभा, शिव सेना जैसे आपराधिक संघटनों पर लगाम कसने के बजाय अरूण जेटली और महेश शर्मा जैसे मंत्रीगण इस देश की सामूहिक बुद्धिमता पर वार करने खड़े हो गये? बहरहाल, ये सरकार देश के बुद्धिजीवियों के सरोकारों को नहीं खरीद सकी यही इस ऐतिहासिक प्रकरण का सबसे आशाजनक पहलु है. 
देश की अब तक की सबसे संवेदनहीन सरकार जिसके कृषि मंत्री कहते हैं की किसान नाकाम-इश्क़ और नाकाम-सेक्स के कारण आत्महत्या कर रहे हैं, जिसकी वरिष्ठ मंत्री देश के संविधान के बजाय अपने धर्म की किताब को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करती हैं, जिसके मंत्री मीडिया को वैश्या जैसा बिकाऊ बता कर नामकरण करते हैं 'प्रेस्टीट्यूट', 
जिसके नेता विपक्ष को 'हरामज़ादे' कहते हैं, जिसके मंत्री संविधान को धता बता कर भारत को एक धार्मिक राष्ट्र मानते हों, और जिसके मंत्री बात-बात पर पाकिस्तान भेज देने का हांका लगाते हों, और अवाक अवाम इस सब को बर्दाश्त कर रही हो, उस मजबूर दौर में अपने होने को सार्थक करते ये बुद्धिजीवी, अपने त्याग और दुस्साहस के लिए उस सूची में दर्ज रहेंगे जिसमे प्रतिरोध का इतिहास जगमगाएगा. 

Monday, August 3, 2015

http://beta.theweek.in/theweek/specials/Nirbhaya-centre-for-women.html


25SheebaAslam
Empower, not just protect 
By Sheeba Aslam Fehmi
I have been doing teachers' training as well as workshops with groups such as the Central Reserve Police Force, the Border Security Force, the Central Industrial Security Force, the Haryana Institute of Public Administration and the IPS Academy in Hyderabad for nearly a decade now to create awareness about gender issues. The armed forces have a patriarchal understanding of helping, protecting and dealing with women. They do not see it as dealing with an equal, which you can do only if you remove patriarchal protocols such as a woman needs to be accompanied by a male. The problem is that the government sees gender issues as ‘protection of women’ as opposed to empowering them.
There are two aspects when dealing with government organisations like the CRPF or the BSF. One, while they seem to welcome women cadre into their fold, they say it is unsafe for women to be on the front line. Even basic facilities such as toilets aren't provided. Two, frisking at borders poses problems in terms of facing cases of sexual harassment because you don't have women professionals posted there. Also, in the past two years after new laws came into force post the Nirbhaya case, people openly say, “We are scared to have women colleagues around and are better off without them.”
If we are unable to stop rapes, then obviously we need more of such measures like the one-stop centres. The main problem is all such courses come into action after the crime has been committed. For example, centres dealing with such trauma cases in Pakistan have rape-kits containing swabs for taking semen samples and forensic tools to preserve the evidence including clothes. We don't have such basic tools in place yet. As a society, we are ill-equipped with the post-crime paraphernalia as well as unable to contain the crime from happening in the first place. That is why we need ‘empowerment’ more than trauma handling centres. Society needs to learn to admire strong women instead of creating vulnerable notions of womanhood. Such centres are a welcome initiative, but the problem needs to be dealt with at deeper levels.
When it comes to feminism, we are in a transitory phase. From the mainstream of urban, educated, upper caste Hindu elite women leading the feminist agenda, we are now heading towards different identity groups asserting their agendas—dalits, tribals, women of northeast, women of Kashmir and Muslim women. An aberration is the ‘cultural nationalists’ trying to enter as ‘feminists’ into the mainstream, supported by fringe organisations. They don't question their subordination in the organisation or family, they don’t question the anti-women cultural practices either; they just prepare themselves to ‘combat’ the ‘other’ identified by the paternal organisations. Funnily, they are being trained for armed combats with they don’t know whom as they are never going to the border areas or other flashpoints within the country.
For the feminist movement to move forward, it needs to develop an internal critique in India. We need to question the jingoistic expression of the nation that is punya bhoomi and dev bhoomi, and not an enabling entity for the citizenry. 
Fehmi is a gender trainer and feminist writer.
TOPICS : #women | #social

Wednesday, June 17, 2015

http://tehelkahindi.com/controversy-on-yoga/

इन दिनोंA- A+

‘योग का मतलब तो कुल-जमा होता है !’

योग ही नहीं आयुर्वेद, शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय-नृत्य आदि हिंदू पद्धति की ऐसी देन हैं जिस पर हिंदू-मुसलमान समेत सभी भारतीय समान अधिकार मानते हैं
yoda
‘योग और इस्लाम’ को आप एक बार गूगल पर सर्च कर के तो देखिये! भारत ही नहीं दर्जनों मुस्लिम देशों में योग पर चर्चा और समर्थन दिख जाएगा. और तो और अशरफ एफ.निजामी ने 1977 में ही बाकायदा एक किताब लिखी जिसका शीर्षक है ‘नमाज : द योगा ऑफ इस्लाम’. यानी योग मुसलमानों के लिए कोई इस्लाम विरोधी क्रिया नहीं रही है, वरना नमाज की एक सकारात्मक तुलना योग से क्यों होती रही बार-बार? बल्कि योग ही नहीं आयुर्वेद, शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय-नृत्य आदि भी हिंदू पद्धति की ऐसी ही देन हैं जिस पर हिंदू-मुसलमान सभी भारतीय समान अधिकार मानते हैं. तो फिर आखिर ऐसा क्या हुआ की योग को लेकर समझदार, उच्च शिक्षित और धर्मनिरपेक्ष मुसलमान भी विरोध में खड़ा हो गया? दरअसल ये जिद पैदा करवाई गई. एक फ्रंट खोला गया जो ये आभास कराए कि अब भारत हिंदूवादी दस्तूर की तरफ बढ़ रहा है और गैर-हिंदू यहां लाचार होकर जिएगा.
भारतीय जनता पार्टी के 2014 के चुनाव घोषणा पत्र में ‘योग-व्यायाम और सूर्य-नमस्कार’ को अनिवार्य बनाना नहीं लिखा था. जो लिखा था वो है अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, कश्मीर से धारा 370 का खात्मा और यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करना. इसके अलावा वादा था कि महंगाई खत्म होगी, भ्रष्टाचार खत्म होगा, महिलाओं पर हिंसा खत्म होगी, काला धन वापस आएगा. जाहिर है, जो लिखा था और जिसका वादा था उससे तो सरकार और पार्टी दोनों मुंह मोड़ चुकी हैं, बल्कि इसके उलट कश्मीर में भाजपा गठबंधन की सरकार में लगातार वो काम किए गए जो अगर पिछली सरकार के समय हो जाते तो आसमान टूट पड़ता, लेकिन फिर भी अपने उस वोटर के लिए कुछ तो करना था जो ये मान रहे थे कि मोदी जी की सरकार बनी तो मुसलमानों को ‘ठीक’ कर देंगे. ऐसे मानस को शांत रखने के लिए सरकार ने हिंदूवादी संगठन और चेहरों को बेलगाम कर रखा है जो बयानबाजी से ये आभास देते रहे कि मुसलमानों को इस सरकार ने टाइट कर रखा है और अब मुसलमानों को भारत में रहना है तो ‘हमारी’ शर्तों पर रहना होगा.
भारतीय संविधान का मात्र क-ख जानने वाले भी जानते हैं कि वंदे मातरम की ही तरह योग को भी सबके लिए अनिवार्य करना सरकार के लिए नामुमकिन है और इसके लिए धर्म की आजादी का तर्क लाने की भी जरूरत नहीं. देश का संविधान ये आजादी देता है कि आप न चाहें तो आपसे जबरदस्ती ऐसा कोई काम नहीं करवाया जा सकता, भले ही वो आपकी सेहत के लिए कितना भी लाभदायक क्यों न हो. तमाम गैर-हिंदू, जिनमें धार्मिक अल्पसंख्यक और नास्तिक अल्पसंख्यक शामिल हैं, उन्हें इस ‘जबरदस्ती’ के कारण ही योग का विरोध करना पड़ा जबकि दुनिया के तमाम हिस्सों में स्वेच्छा से योग-दिवस मनाया जाएगा. ‘स्वेच्छा’ को ‘जबरिया’ में बदलकर योगी आदित्यनाथ और उनके हमखयाल हिंदू-संस्कृति के रखवालों ने इस तरफ ध्यान दिला दिया की योग एक ‘धार्मिक पद्धति’ है, इसमें ओम, सूर्य-नमस्कार, मंत्रोच्चारण, श्लोक आदि भी शामिल हैं और भारत का विश्वविद्यालय अनुदान आयोग योग के सिलेबस में लपेटकर धर्म पढ़ा रहा है. यानी, योग के शाब्दिक अर्थ तो हैं ‘कुल-जमा’, जिसे राजनीति ने ‘घटाने’ का औजार बना दिया.
खुद योगाचार्यों के बीच इस बात को लेकर काफी रोष है कि बाबा रामदेव ने योग का पेटेंट और ब्रांडिंग जिस प्रकार की है वो अश्लील बाजारवाद है और इस सरकारी अनिवार्यता की कोशिश को वो पतंजलि बिजनेस साम्राज्य की सेवा मानते हैं. दूसरी तरफ कानूनविद हैं जो संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के तहत ऐसी किसी भी अनिवार्यता को असंवैधानिक करार दे चुके हैं, तीसरी तरफ हैं वो मुसलमान प्रवक्ता जो इसे इस्लाम से जोड़कर धर्म आधारित विरोध कर रहे हैं और चौथी तरफ वो समाज है जो धर्म को नहीं मानता. सूर्य उसके लिए ब्रह्मांड का एक सितारा मात्र है और भूख से बदहाल देश में योग एक ‘ओवररेटेड’ बेवकूफी.
योगी आदित्यनाथ ने भारत में ही योग के कई मुखर विरोधी अपने उस एक बयान से पैदा कर दिए, जिसमें उन्होंने फरमाया की ‘सूर्य नमस्कार करना
जरूरी है, जिसे एतराज हो वो समंदर में डूब मरे’(और अल्पसंख्यकों को आधी रात में भी साथ देने का भरोसा दिलाने वाले प्रधानमंत्री विभाजन की इस राजनीति पर चुप हैं).
योगी आदित्यनाथ से मेरा सवाल है कि अगर मैं नमाज न पढ़ूं तो क्या कोई मौलाना मुझे समंदर में फेंक सकता है?

Tuesday, June 2, 2015

http://tehelkahindi.com/feminism-and-my-choice/

फेमिनिज्म का फैशन बन जाना

‘बराबरी, न्याय और आजादी’ के सार्वभौमिक सिद्धांत के बाहर जाते ही नारीवाद आत्म-केंद्रित विलास बन जाता है
my_choice
हॉलीवुड की मुख्यधारा की फिल्मों में और मुख्यधारा के भारतीय नारीवाद में कुछ दिलचस्प समानताएं बताऊँ आपको? पिछले 3-4 दशकों से हॉलीवुड की मुख्यधारा की फिल्में वो हैं जो कि या तो दूसरे ग्रहों से आये एलियंस से निबट रही हैं, या फिर किसी रासायनिक-प्रदूषण की जद में आए ऐसे कीड़े-मकोड़े से जो किसी केमिकल-लोचे की वजह से इतना विशालकाय हो चुका है जिससे पूरी दुनिया को खतरा है और जिस पर जाबांज अमरीकी वैज्ञानिक-हीरो बहरहाल अकेले फतह पा लेता है. दोनों ही मामलों में ये फतह टीम की न होकर हीरो की होती है. यानी इन फिल्मों से जो सीधा सन्देश दिया जाता है वो पर्यावरण और प्रकृति से छेड़छाड़ न करने का होता है, लेकिन असल और बारीक सन्देश तो ये होता है की अमरीकी समाज अब उन सामाजिक समस्याओं और अपराधों से मुक्त है जिनमें बाकी दुनिया फंसी हुई है, और जिसके केंद्र में गैर-बराबरी, अन्याय और गुलामी है जो की हशिये पर खडे़ और वंचित समाज का निर्माण करती है, और जिसके घिनौने नतीजे पूरी दुनिया झेल रही है. पूंजीवाद, डिफेन्स-इंडस्ट्री और कॉर्पोरेट को जायज़ ठहराने के लिए सतत-दुश्मन (गैर-श्वेत, गैर-ईसाई/यहूदी पढ़ें) की जरूरत पर ये फिल्में चुप हैं. मानवाधिकारों के घनघोर उल्लंघन पर ये फिल्में चुप हैं, भयानक युद्ध सामग्री के नागरिकों पर इस्तेमाल पर ये फिल्में चुप हैं, डिफेन्स-कार्टेल की अंतरराष्ट्रीय साजिशों पर ये फिल्में चुप हैं. ये फिल्में बताती हैं की पूंजीवाद द्वारा अमरीका में आदर्श समाज स्थापित हो चुका है, अब लड़ाई बस एलियंस और प्रदूषण से है.
ऐसे ही भारतीय मुख्यधारा का नारीवाद भी उस लगभग-आदर्श समाज की सोफिस्टिकेटेड चौहद्दी में काम करने लगा है जिसमें उसके एक्सक्लूसिव-मुद्दे हैं फिल्म उद्योग में महिलाओं से गैर-बराबरी, कवियत्रियों पर आलोचकों की उदासीनता, साहित्य-पुरस्कारों में गैर-बराबरी, सार्वजानिक-नग्न्ता के बुनियादी हक़ पर रोक, ‘मनोरंजित’ होने के हक में गैर-बराबरी, आजाद-सेक्स पर रोक, मासिक-धर्म जैसे ‘अन्याय’ पर पुरुषों की उदासीनता, जैसे संभ्रांत मुद्दे भारतीय नारीवाद के मुख्य-पटल पर आ चुके हैं, और इनका समाधान भी एक ढाई मिनट की विज्ञापन फिल्म को पुरुषों के दिमाग में उतारकर मुमकिन है. ये वाला नारीवाद पूंजीवाद-उपभोक्तावाद-मार्किट-मीडिया-मूवमेंट के उत्सव का समर्थक है.
तो आखिर ये कौनसी स्त्रीवादी नजर है जिससे दलित महिलाओं को नंगाकर गांव में घुमाकर जिंदा जलाने के हादसे बच जाते हैं? जिससे आदिवासी महिलाओं के बलात्कार-हत्याएं नजर नहीं आतीं? जिससे मुजफ्फरनगर नस्लकुशी के गैंगरेप-हत्याएं नदारत रहती हैं? जिसमें दलित महिला के चुनाव जीतने पर उसे बतौर सजा गोबर खिलाया जाना नहीं दिखता? लेकिन एक शहरी लड़की का टैक्सी में हुआ बलात्कार इसलिए ज्यादा बड़ा अपराध बनता है क्यूंकि वो नशे में थी, मनोरंजित होकर वापिस जा रही थी और ऐसे में उसके साथ अपराधकर उसकी एक आइडियल शाम बर्बाद की गयी (मुझे पता है की ये लिखने पर मेरी पिटाई होनी है), एक नीच ड्राइवर की इतनी जुर्रत?
तो क्या कुल मिलाकर इस नारीवाद की नजर में सिर्फ दो बड़े अपराध हैं? एक- जिसमें उसके अपने से नीचे स्तर का पुरुष जाति और वर्ग की सीमा-रेखा पारकर उसके शरीर की अवहेलना करता है, और दो- जिसमें उसके अपने वर्ग या जात का पुरुष उसके प्रति उदासीन है. यानी ‘बराबरी, न्याय और आजादी’ के सार्वभौमिक सिद्धांत के बजाय वर्ग हित के दायरे में सार्वभौमिकता खोजना. ये संकुचित संवेदनशीलता 80 प्रतिशत का हाशिया बना देती है! कमाल! और मीडिया-न्यायपालिका में बैठे इनके मर्द उस पर ‘आम-सहमति’ का ठप्पा लगवा लाते हैं.
दुनिया की आधी आबादी को पॉलिटिकल-इकोनॉमी की बहस से बाहर रखने में महिला पत्रिकाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है. ये पत्रिकाएं ही तो हैं जो सलाद से लेकर सालसा तक सिखा रही हैं
यानी पुलिस-सेना द्वारा किया गया गैंग-रेप, हत्या क्यूंकि कमजोरों, वंचितों और अल्पसंख्यकों के साथ होता है इसलिए उस पर दिल्ली में आंदोलन नहीं होता, गाँव-कस्बों में ऊंची जात के पुरुषों द्वारा दलित महिला पर जघन्य हिंसा पर दिल्ली में आंदोलन नहीं होता, मुस्लमान-सिख-ईसाई महिला के साथ हिन्दू पुरुष-पुलिस-सेना द्वारा जो गैंग रेप-हत्या होती है उस पर आंदोलन नहीं होता. कुल मिला के सत्तासीन वर्ग की महिलाओं के पास उपलब्ध मंच-मीडिया-मूवमेंट बहुत संकुचित भागीदारी कर रहा है जिसकी दृष्टि में 70-80 प्रतिशत जनसंख्या के प्रति होनेवाले अपराध मायने नहीं रखते.  सार्वजानिक क्षेत्र में वंचितों को अवसर और प्रतिनिधितव के सवाल तो खैर शान्ति-कालीन एजेंडे में ही हो सकते हैं , जिन पर अभी क्या बात करें? लेकिन दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के साथ घटित होती, आंखें पथरा देनेवाली, दिल दहला देनेवाली हिंसा की कहानियां तक इस वर्चस्ववादी नारीवाद को छू नहीं पातीं?
kanya_kumari
इस सीमित नजर के नारीवाद के पास एक बड़ी पैदल सेना है जो युवा है, और मीडिया में जिसका हस्तक्षेप है, ये किसी भी फालतू पर नई सी लगनेवाली बात को ‘ट्रेंड’ करवा सकती है और ट्विटर से प्राइम-टाइम तक पहुंचा सकती है. लेकिन जिसके पास ये समझ नहीं है की साम्यवादी या दलित आंदोलन की ही तरह नारीवाद भी एक थ्योरेटिकल अनुशासन के तकाजों से बंधा है. ‘बराबरी, न्याय और आज़ादी’ के सार्वभौमिक सिद्धांत के बाहर जाते ही नारीवाद वो आत्म-केंद्रित विलास बन जाता है जिसका ऊपर जिक्र किया गया है. इंजीनियरिंग, आई-टी, मार्केटिंग, मास-कॉम की डिग्रियों से लैस, इस पैदल सेना को नहीं पता, की भारत में जातिवादी-हिंदुत्व द्वारा महिलाओं के साथ हुई बर्बरियत को केवल नारीवादी चश्मे से देखकर उसे समस्या न मानना, उसे महिला-आयोग की बेअसर रिकॉर्ड बुक तक सीमित कर देना है. और पूंजीवाद की सेवा में समर्पित राष्ट्र-राज्य के लिए इससे सुखद स्थिति और क्या होगी? मसलन, मलाला बनाम तालिबान मामले ही को देखें. जिसमे मलाला और तालिबान पर बात करनेवाले भूल गए की इन दोनों की डोर पूंजीवाद के हाथ में है, और पूंजीवाद के लिए ये दोनों स्क्रिप्ट की जरूरत हैं. इस पैदल सेना के पास सैद्धांतिक समझ की कमी ही वो कारण है जिसके चलते नारीवाद एक फैशन में तबदील हुआ जा रहा है.
अभी बीते 08 मार्च, यानी महिला दिवस पर कार्लरुहे, जर्मनी से एलोने नमक 2० साला युवती ने कुछ प्रचलित नारीवादी स्लोगन की पर्चियां माहवारी वाले नैपकिन्स पर चिपकाईं और 10 मार्च को ही भारत में नारीवाद को ‘अगले चरण’ में पहुंचा दिया. पुरुष माहवारी से नफरत न करें और उसके प्रति संवेदनशील हो जाएं. ठीक! लेकिन इस संवेदनशीलता की असलियत अगले ही हफ्ते कुंवारी-कन्या जिमाने में सामने आ गयी और सैद्धांतिक समझ से खाली इस पैदल सेना को ये सूझा ही नहीं की ‘कौमार्य’ का उत्सव असल में उनकी उस प्रिय ढाई-मिनट की वीडियो और ‘माहवारी-संवेदनशीलता’ के घनघोर विरोध में है. मीडिया में कन्या जिमाने की तस्वीरें जोश के साथ लगाई गईं पैदल सेना ‘लाइक’ और कॉमेंट करती रही. उन्हें नहीं पता चलता की ढाई मिनट के विज्ञापन वीडियो का निर्माण उस मीडिया ने किया जो महिलाओं को पुरुषों के लिए तैयार होना सिखाती रही है, और जिसकी अदाकारा गोरेपन की क्रीम बेचती रही है. दुनिया की आधी आबादी को पॉलिटिकल-इकोनॉमी की डिबेट से बाहर रखना, महिला पत्रिकाओं के सहयोग से ही जारी है. ये महिला पत्रिकाएं ही तो हैं जो सलाद से लेकर सालसा तक सिखाती हैं लेकिन इस बहस में कभी नहीं घुसतीं की दुनिया में संसाधन किस तरह बराबरी से बांटे जाएं. यानी नारीवाद ने वो बुनियादी मसले हल कर लिए हैं हॉलीवुड फिल्मों की तरह.
http://tehelkahindi.com/feminism-and-my-choice/

http://tehelkahindi.com/view-on-tanu-weds-manu-returns/#

हंस लीजिए, लेकिन खुश होने वाली बात नहीं है !

फिल्म में सब कुछ कॉमेडी की चाशनी में ऐसे घोला गया है कि आपको ऐतराज नहीं होता
tanu-weds-manu-2-poster


आपने बेरोकटोक पहनने की आजादी मांगी, घूमने-फिरने की आजादी मांगी, शराब पीने की आजादी मांगी, सेक्स-पार्टनर चुनने की आजादी मांगी, बहु-संबंधों की आजादी मांगी, जिम्मेदारियों से आजादी मांगी- उन्होंने दे दी! और इन सब आजादियों को मिला के ऐसा किरदार बना दिया जो अपने आसपास के हर इंसान को आतंकित किए रखता है… अब आप डैमेज-कंट्रोल करती रहिए.
फिल्में कम देखती हूं इसलिए स्त्रीवादी हिंदी फिल्मों पर कोई राय नहीं है. इस वजह से तुलना नहीं कर सकूंगी लेकिन ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ देखी है. सोशल मीडिया पर पढ़ा था कि एम्पावर्ड वीमेन की कहानी है. फिल्म देख के बस वो मुसलमान मर्द याद आए जो बुरका का समर्थन करते समय नग्नता का हवाला देते हैं, कि आप को शरीर ढकने से ऐतराज है क्योंकि आप न्यूडिटी पसंद करते हैं. मानो बुरका और न्यूडिटी के बीच जींस-टॉप, साड़ी, लहंगा, सलवार-कमीज, स्कर्ट-फ्रॉक आदि कुछ है ही नहीं. उसी तरह या तो एक महिला दबी-कुचली आदर्श नारी होगी या फिर बे-उसूल, बेवफा आजाद तितली. महानगरों में रह रही मेहनतकश, संघर्षरत, स्वयं-सिद्धा, स्वाभिमानी और व्यसनहीन ‘दत्तो’ का अकेले रह जाना बहुत सालता है.
तनु वेड्स मनु रिटर्न्स हॉल के भीतर आपको हंसने से फुर्सत नहीं देती. हॉल के बाहर आइए तो भोले-भाले क्यूट डायलॉग्स गाने की तरह गुनगुनाते रहिए. करैक्टर आर्टिस्ट्स के दृश्य इतने जानदार हैं कि मुख्य कलाकारों के बराबर खड़े हैं. यूपी और हरियाणा का समागम तो मानो दिल्लीवालों के दिल की बात हो गई. लेकिन इसके साथ-साथ ‘तनु’ और ‘दत्तो’ पर बारीक विश्लेषण भी जारी है. कुछ लोग इसे नारीवाद और एम्पावर्ड वीमेन के नजरिये से देख रहे हैं.
मुझे यकीन है कि इस फिल्म की पुरुष टीम नारी-स्वछंदता से भयभीत है. मजाक-मजाक में फिल्म बता गई है कि आज की शहरी लड़की खुद-परस्त, धोखेबाज, बेवफा, बे-दिल, पुरुष-शोषक और बे-किरदार इंसान है. वो पति पर कमाने, खिलाने, रखने का बोझ तो डालती ही है साथ ही वो पति को निरंतर एक आशिक, हंसोड़-मित्र और मनोवैज्ञानिक बने रहने का अतिरिक्त भार भी डालती है, और ये सब करते समय उसकी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है. यानी पति तो उसको सुपरमैन चाहिए और खुद वो एक पैरासाइट जोंक है जो सिर्फ लेना जानती है, देना नहीं.
फिल्म देख वो मुसलमान मर्द याद आए जो बुरके का समर्थन करते समय हवाला देते हैं कि आपको शरीर ढकने से ऐतराज है क्योंकि आप नग्नता पसंद करते हैं
शादी के अंदर और बाहर बस वो पुरुष साथियों का इस्तेमाल कर रही है. पति-पुरुष तो छोड़िए वो खुद-परस्ती में इस हद तक अंधी है की नाकाम शादी से पीछा छुड़ाकर जब मायके में परिवार पर बोझ बनती है तब भी वो उनकी सामाजिक परिस्थिति का लिहाज नहीं करती और परिवार वाले इस आतंक में रहते हैं कि लंदन-रिटर्न बेटी किस परिस्थिति में जलील करवा दे. मायके में वापसी कर वो रोजगार या आत्मनिर्भर होने की कोशिश नहीं करती बल्कि निकल पड़ती है अपनी बोरियत मिटाने और पीछे छूट गए आशिकों में संभावनाएं तलाशने.
उसके कपड़े, उसके परिधान-श्रृंगार, उसकी शराब, उसका घूमना-फिरना, मर्दों का इस्तेमाल करना आदि सब कुछ कॉमेडी की चाशनी में ऐसे घोला गया है कि आपको उस वक्त ऐतराज नहीं होता, लेकिन अपने साथ ही बैठे एक नौजवान मर्द को चहकते हुए मैंने कहते सुना, ‘मेरी गर्लफ्रेंड भी ऐसी ही बवाली थी,  हे भगवान तेरा शुक्र है कि पीछा छूट गया, वरना न काम का रहता न काज का !’ इस फिल्म में एक तनु के कारण बाकी सभी चरित्र दुखी हैं या
मुसीबत में हैं, ऐसी लड़की, नए कानूनों से डरे बैठे शहरी पुरुषों को सिर्फ और डरा सकती है.
अब हमारे हिंदी फिल्म निर्माता भी सामंती रिश्तेदारों की तरह, महिला की खुद-मुख्तारी को एक सुर में नग्नता, सुरापान, उन्मुक्त-यौन संबंध तक सीमित कर वही तर्क दे रहे हैं जो बुरके की अनिवार्यता पर कठमुल्ले देते हैं कि अगर आपको बंद-गोभी की तरह बुरका-बंद होने से ऐतराज है तो लाजमी तौर पर आप बिकिनी-न्यूडिटी समर्थक हैं, जबकि समाज की सच्चाई कुछ और है.

Sunday, March 8, 2015

http://epaper.prabhatkhabar.com/454080/RANCHI-City/City#page/13/2

हम बलात्कार विरोधी नहीं हैं !

-- शीबा असलम फ़हमी 
sheeba_atplus@yahoo.com

आख़िर क्या बात है की सिर्फ़ महिलाओं (पुरुष नहीं) की यौन-शुचिता को जीवन-मृत्यु का सवाल मानने वाले समाज में यौन-शुचिता भंग करनेवाले अपराध को समाज, पुलिस, क़ानून, अदालत, सज़ा ,फांसी, फिर नरक के भय पर आधारित-धर्म तक रोक नहीं पा रहा है? कोई तो वजह होगी?
मेरी समझ से दो वजहें हैं इसकी - 
1 ).  की हमें हर बलात्कार से असुविधा नहीं है, और जिन से असुविधा नहीं है उन पर कोई पब्लिक डिबेट है ही नही. मसलन दलित, आदिवासी, मुस्लमान और ईसाई महिलाओं के बलात्कार पर घनघोर चुप्पी चारों तरफ पसरी हुई है. 
2 ).  जिस बलात्कार से हमें आपत्ति है उसे भी हम पीड़ित को मज़बूत कर के नहीं रोकना चाहते बल्कि उसे रोकने के लिए भी हम मरदाना-प्रोटोकॉल यानि बाहुबल यानी 'पुलिस-पिता-भाई' के सुरक्षा-कवच से ही रोकना चाहते हैं. मतलब ये कि जैसे ही इस सुरक्षा-कवच की लक्ष्मण रेखा लांघी तो महिला ने ख़ुद ही इस अपराध को न्योता दिया! ये सिर्फ़ भ्रम है की भारतीय समाज महिलाओं पर होनेवाले यौन-अपराधों के प्रति संवेदनशील है/या हो गया है/या हमेशा से था। हाँ ये ज़रूर सही है कि सत्ताधारी पुरुष वर्ग बस 'अपने' समाज की महिलाओं को ऐसे हादसे का शिकार होते नहीं देखना चाहता. इसमें भी ऐसा नहीं है की वो बलात्कार की पीड़ा और पीड़ित के प्रति किसी संवेदनशीलता के चलते 'अपनी महिलाओं' को बचाना चाहता है, ना ! बात सिर्फ इतनी है की घर-परिवार के पुरुषों की इज़्ज़त का वास बहन-बेटी की योनि में माना है, हमारी महान संस्कृति ने. अतः अपनी इज़्ज़त के इस 'निवास' पर वो केवल अपना पहरा और मर्ज़ी मानता है, और इसीलिए उसने इसकी सुरक्षा का सारा दारोमदार, मर्दाने-बाहुबल पर झोंक दिया है. इस सत्ताधारी पुरुषवर्ग की 'इज़्ज़त' क्यूंकि उसकी बहन-बेटी की योनि में सिमटी हुई है इसलिए खुद बहन-बेटी भी अपने शरीर पर अपना अधिकार नहीं रखती है. अपना शरीर वो अपने मन-पसंद को नहीं दे सकती. अपना शरीर वो सिर्फ अपने 'पिता-भाई की पसंद' को ही दे सकती है. लेहाज़ा वास्तविकता ये है की बलात्कार की असली परिभाषा हमारे समाज में ये है की 'पिता-भाई की मर्ज़ी के बग़ैर जो शरीर भोगेगा वो बलात्कारी। लड़की की मर्ज़ी के बिना उसके शरीर को बाप-भाई की मर्ज़ी के सर्टिफिकेट से लैस मर्द 'पति' रूप में रौन्दता ही रहा है, जिसका समाज जश्न मनाता है. इसीलिए बाप-भाई महिला को ख़ुद सशक्त करने में अपना हक़ अदा नहीं करते, क्यूंकि अगर बेटी-बहन ख़ुद ही सशक्त हो गई तो अपनी मर्ज़ी से अपना फ़ैसला करने लगेगी, यानी वो 'हर प्रकार के बलात्कार' को रोकने में सक्षम हो जाएगी, यानी उसके शरीर में जो घर के मर्दों की 'इज़्ज़त' का स्थान है वो उसमे से बेदख़ल हो जाएंगे, इसलिए बजाय लड़की को सशक्त करने के वे केवल उस समय तक अपनी इज़्ज़त की पहरेदारी करते हैं जब ये मालिकाना हक़ वे अपने मर्ज़ी के अन्य पहरेदार (दामाद पढ़ें) के हवाले नहीं कर देते हैं. नया पहरेदार (पति पढ़ें) भी ज़िम्मेदारी ये सुनिश्चिंत कर के लेता है की लड़की उस से दबी रहे, शर्माए, चुनौती न दे, आज्ञाकारिणी रहे और अपने शरीर को मालिक के लिए आरक्षित रखने हेतु ख़ुद ही घर-घुसनी हो रहे. 
तो जनाब दूसरी कैटेगरी के जिस बलात्कार से हमें बड़ी असुविधा है क्यूंकि उसमे मर्द की अपनी 'इज़्ज़त' लुट जाती है उसे भी मर्दवादी तरीके से ही रोकने का रास्ता वे सुझाते हैं समाज को. हम सब जानते हैं की शारीरिक हमला करने से पहले हमलावर अपने शिकार को आँकता है, अपने से ज़यादा या अपने बराबर की हिम्मती, दृढ़, मुखर और मज़बूत दिखनेवाली महिला को पस्त करने का जोखिम उस लम्हा बलात्कारी नहीं ले सकेगा. लेकिन कोई भी महिला अचानक खतरे के सामने आते ही तो मुक़ाबला करने लायक हो नहीं जाती। 'ना' करने की, न माने तो प्रतिरोध करने की, और पछाड़ देने की मनःस्तिथि किसी भी इंसान के व्यक्तित्व में शुरुआत से ही डाली जा सकती है. 
जिन घरों में महिला बचपन से ही खान-पान, इलाज, देख-रेख, शिक्षा, आज़ादी में निकृष्ट रखी जाती है, पारिवारिक फैसलों से बेदखल, जायदाद से बेदख़ल और दोयम दर्जे की आदी हो जाती है, वो महिला ससुराल, पति के घर, ऑफिस-कार्यस्थल, सड़क और संस्थान सभी जगह एक कमज़ोर और आश्रित व्यक्तित्व के कारण हर सही-ग़लत बर्दाश्त करने को मजबूर होती है. महिला पिता के घर से ही आश्रित या सशक्त हो सकती है. लेकिन हमारी महान संस्कृति की दुखती रग है बेटी-बहन की शर्मगाह में परिवार की इज़्ज़त ! बेटियों के शरीर का इस्तेमाल बदला और रंजिश में, इसी महान दुखती-रग के कारण होता आया है. और इस व्यवस्था को चैलेंज करनेवाली महिलाओं को बलात्कार रुपी सज़ा इसी मानसिकता के तहत दी जाती है. सजा देने का स्थान सड़क से ले कर घर, मंदिर, हस्पताल कुछ भी हो सकता है. 
जिन लोगों ने १६ दिसंबर के बाद प्रदर्शन किये उन्होंने क्या अपनी बहन को असुरक्षा से निकलने का कोई प्रयास अपने घर में किया? हाँ एक काम किया की पाबन्दी बढ़ा दी, पहनने की, निकलने की, समय की, साथी की।
दिल्ली रेप कांड का मुजरिम मुकेश, उसके दोनों वकील, तहलका के स्टिंग में ख़ुफ़िया कैमरे  पर बोलने वाले थानाध्यक्ष, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, साधू, बापू, बाबा, और सभ्य-समाज के श्री मुख से लेकर देश के प्रधानमंत्री (याद कीजिये की 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' योजना के उद्घाटन पर उन्होंने कहा था की जब बेटी पैदा हो तो 5 पेड़ लगाओ जिससे उसके दहेज़ का ख़र्च निकला जा सके) तक चीख़ - चीख़  के यही तो कह रहे हैं हम महिलाओं से, शायद हम ही सुन नहीं पा रही हैं की 'वापिस लौट जाओ घर के कोने में, वरना हम दुनिया से लौटा देंगे'. 

Published in Prabhat Khabar on 8th March 2015.

Monday, February 23, 2015

https://www.facebook.com/video.php?v=289021087864982&set=o.125011034270331&type=2&theater

HINDUSTAN me har 22 minute me 1 RAPE.
Kam umr me shaadi karwadene se rok sakte hai RAPE ???

sirf haryana ka hi nahi balke saray desh ka maamla hai
http://khabar.ndtv.com/video/show/hum-log/250730

एक 'अहिंसक' बहस खाप के प्रतिनिधि और आप के बीच... इस बार के हम लोग में... पेश कर रहे हैं रवीश कुमार।
https://www.youtube.com/watch?v=dYbNM4McTho

Ravish ki Report E07 - क्या बुर्का ज़रूरी है ?

http://khabar.ndtv.com/video/show/badi-khabar/badi-khabar-controversy-over-amu-s-vc-comment-344497

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी एक बयान को लेकर चौतरफा आलोचनाएं झेल रहे है। इसमें उन्होंने लाइब्रेरी में लड़कियों की सदस्यता पर लगे प्रतिबंध को हटाने से इनकार किया है। तो बड़ी खबर में आज इस पूरे मुद्दे पर करेंगे एक खास चर्चा...
http://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/prime-time-the-controversy-around-jama-masjids-imam-343355

आज बड़ी संख्या में मौलवी, मुस्लिम विद्वान और इस्लाम को मानने वाले लोग यह सवाल कर रहे हैं कि इमाम आप शाही कब से हुए और कब तक इस पदवी को ख़ानदानी बनाकर रखा जाए। तो प्राइम टाइम में आज इसी मुद्दे पर एक चर्चा...
http://tehelkahindi.com/freedoms-of-the-slavery/

‘आजादियों की गुलामी’

इलस्ट्रेशनः आनंद नॉरम
इलस्ट्रेशनः आनंद नॉरम
आज ही राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत से सीधे सऊद परिवार के कार्यक्रम में शामिल होने सऊदी अरब निकले हैं. अमेरिका का सऊद-परिवार से बड़ा खास रिश्ता है. उसी ठग सऊद परिवार से जो अरब-अफ्रीका-दक्षिण एशिया में पेट्रो-डॉलर के जरिये अपनी तमाम नाजायज औलादों से इस पूरे भूभाग को जहन्नुम बनाए हुए है. सिर्फ इसलिए की कहीं उसके मालिकों का शस्त्र-उद्योग मंदी का शिकार न हो जाए और यहां की अवाम पूंजीवाद के उन मोहरों को अपदस्थ न कर दे जो सऊदी अरब से लेकर पाकिस्तान तक हुक्मरान बने बैठे हैं. लेकिन ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ वाले इस दौर में भी कोई माई का लाल अमेरिका और यूरोप से यह सवाल नहीं पूछता कि मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, क्रांति, नास्तिकता, नारीवाद जैसे महान सिद्धांत सऊदी अरब के मामले में निलंबित अवस्था में ही पड़े रहेंगे क्या? और हर तरह की आजादियों के चैंपियन अमेरिका का सबसे ‘घनिष्टतम सहयोगी’ सऊदी अरब आखिर कब तक गैर जवाबदेही काल में मौज करेगा? सऊदी अरब की खड़ी की गई अवैध फौजों की हरकतों पर जवाबदेही क्या उन निरीह सेक्युलर सहिष्णु मुसलमानों की ही बनती है जो शर्ली हेब्दो हत्याकांड की सबसे पहले निंदा करते हैं. लेकिन साथ ही उन्हें ये भी जरूरी लगता है की अश्लील कार्टूनों के जरिये उनके पैगंबर का उपहास न उड़ाया जाए.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार या ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा कुल जमा सत्तर-पिछत्तर साल पहले, दुनिया के समक्ष लाया गया सिद्धांत है. ये प्रबोधन काल में पैदा हुई वैयक्तिक स्वतंत्रताओं के सबसे परिष्कृत सिद्धांतों में से एक है. यानी यूरोप में मध्यकाल से शुरू हुए पुनर्जागरण से लेकर लोकतांत्रिक व औद्योगिक क्रांतियों के दौर में हुए सघन सामाजिक आत्ममंथन, वैज्ञानिक उपलब्धियों और प्रगतिशीलता के सिद्धांतों के चरम बिंदु पर पहुंचकर हासिल, वो उसूल जिसको पाने में यूरोप की छह से ज़्यादा सदियां खर्च हुईं और जिसका सत है ‘यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स-1948′.
इसमें यह भी याद रखना होगा की यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया समेत कोई ऐसा पश्चिमी राष्ट्र नहीं है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सम्पूर्ण रूप से दी गयी हो. खुद यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स-1948′ भी किंतु-परंतु से मुक्त न हो कर इनसे लदा-फंदा है. यानी कुछ अभिव्यक्तियां ऐसी हैं जो संयुक्त राष्ट्र संघ को भी नामंज़ूर हैं. इसी के साथ पश्चिम के सभी राष्ट्र-राज्यों के अपने-अपने संविधानों में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार असीम या परम सिद्धांत न होकर कई किंतु-परंतु में लिपटा हुआ है. खुद भारत का संविधान, जिसे एक प्रोग्रेसिव, दूरअंदेश और आधुनिकता का वाहक-दस्तावेज माना जाता है, उसमें भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार असीम परम-सिद्धांत न हो कर कुछ जरूरी सावधानियों से लैस है.
ऐसे में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर, कार्टून जैसी व्यंग्यात्मक और उपहास के लिए इस्तेमाल होनेवाली अभिव्यक्ति की शैली को उस समाज के मूल्यों से भिड़ा देना, जिस समाज ने अभी आत्म-मंथन के मुहाने पर सिर्फ पहला कदम रखा है, न सिर्फ शरारतपूर्ण है, बल्कि उस समाज के प्रगतिशीलों और आधुनिकों को असमंजस और ग्लानि से भरना है. इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव में एशिया और अफ्रीका के देशों द्वारा ‘यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स-1948′ पर सरकारों की मोहर लगना एक बात है और इनके अवाम के मन-मस्तिष्क में इन सिद्धांतों को उतरना बिल्कुल दूसरी बात है या कहें कि टेढ़ी खीर है.
इस कड़ी में याद रखना होगा की यही पश्चिम राष्ट्रों का वह गिरोह है जिसने 70 और 80 के दशक में पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान, इराक, मिस्र, इंडोनेशिया सहित तमाम एशियाई देशों में उदार, आधुनिक और सेक्युलर शासकों का तख्ता पलट करवाकर अपने पिट्ठू गद्दीनशीन करवाए थे. इन पिट्ठुओं ने अवाम के बीच वैधता पाने के लिए अल्लाहमियां का एजेंट बन धार्मिक कट्टरवादी अनुकूलन का सहारा लिया. मोसद्दिक, भुट्टो, नजीबुल्लाह जैसे अवामी सेक्युलर शासकों को मौत के घाट उतारकर अमेरिकी पिट्ठुओं को धार्मिक कट्टरता के सहारे लाचार अवाम पर थोपने का अपराधी पश्चिम, अब जेहादियों, तालिबानों, ‘इस्लामिक-स्टेट’ से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध लड़ने का ढोंग कर रहा है.
ऐसे सियासी चक्रव्यूह में घिरे और पश्चिम की नफरत के शिकार समाजों में इस्राइल-अमरीका-यूरोप द्वारा पैगंबर साहब का वस्त्रहीन अश्लील, बेइज्जत करता हुआ कार्टून बनाकर अगर कोई प्रगतिशीलता लाने का सपना देख रहा है तो उसने इसके नतीजों पर भी गौर किया होगा. दशकों से पूंजीवादी व्यवस्था के शोषण के शिकार और भ्रष्ट राजतन्त्र से आजिज नौजवान जब फिदायीन बन खुद को उड़ा सकते हैं तो पेशावर-पेरिस में दूसरों को मारकर, मर भी सकते हैं. जो खुद मरने ही आया है उसे आप कौन-सी सजा दे देंगे?
भारत का संविधान, जिसे एक प्रोग्रेसिव और आधुनिकता का वाहक-दस्तावेज माना जाता है, उसमें भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार  कुछ जरूरी सावधानियों से लैस है
लेकिन मसला तो ये है की एशिया-अफ्रीका के समाजों में धर्म की सियासत को सहिष्णु, सुधारवादी और सहनशील बनाने में लगे उदारवादी, आधुनिक लोग कैसे अपनी मुहिम जारी रखें? जो शार्ली हेब्दो अपने पन्नों पर यहूद-मुखालिफत और इस पर कार्टून की इजाजत नहीं देता उसी शार्ली हेब्दो के मुहम्मद साहब पर बनाए अश्लील कार्टून का लिबरल-मॉडरेट मुसलमान समर्थन करें? ये कैसा इम्तेहान है? आखिर ये धर्म के मूल में आस्था रखनेवाले लोग हैं. इनको अल्लाह और उसके पैगम्बर पर भरोसा है. ये उस मुल्ला वर्ग के विरोधी हैं जिन्होंने धर्म की डरावनी और जड़ व्याख्याएं करके समाज को अपना गुलाम बनाया और तालिबान, बोको हरम, इस्लामिक-स्टेट जैसे संगठनो को विश्वसनीयता प्रदान की. मेरा दावा है की पेशावर-पेरिस काण्ड करनेवाले अपराधी किसी न किसी सिद्धांतकारी उलेमा-गिरोह के प्रभाव में हैं, लेकिन मीडिया, पश्चिम जगत और सिविल सोसाइटी उधर से आंख मूंद लेता है.
खैर, 1990 के बाद से जब दुनिया भर में साम्यवादी व्यवस्थाएं खत्म हुईं, तभी से ऐसे भस्मासुर पैदा किए गए जिनको दिखाकर हथियार उद्योग को सरसब्ज रखा जा सके. तेल के कुओं पर अवैध कब्जा, हथियार मंडी पर कब्जा, और दुनियाभर के बाजारों पर कब्जा जिन्हें हर हाल में चाहिए उन्हें कट्टरवाद और धार्मिक श्रेष्ठतावाद की खेती करनी ही है.
लेकिन हमें शिकायत उस सिविल सोसाइटी, मीडिया और प्रगतिशीलता से है जो आजादी विरोधी फतवों पर तो फिक्रमंद होती है, लेकिन जब शिक्षित-प्रशिक्षित आम मुसलमानों को किराए पर मकान नहीं मिलता तो आंखें मूंद लेती है. जो शर्ली हेब्दो के कार्टून का समर्थन करती है पर बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के कार्टून में आहत भावनाओं की कद्र करती है, जो प्रोफेसर आशीष नंदी से दलितों के प्रति नस्लवादी बयान के लिए माफी मंगवाती है पर प्रवीण तोगड़िया के मुसलमानों को बेइज्जत करनेवाले सैकड़ों बयानों पर दूसरी तरफ देखने लगती है, जो असम के नरसंहारों को तो सामान्य अपराध मानती है पर पेशावर के नरसंहार को इस्लामी कृत्य मानती है, जो उपराष्ट्रपति डॉ हामिद अंसारी के प्रोटोकॉल के पालन को देशद्रोह कहनेवालों से सवाल तक नहीं करती.
सियासी सहीपने के आग्रहों से आजिज आ कर एक मुसलमान ने ‘Muslim iCondemn app’ बना लिया है, जिसे रोज मोबाइल फोन में क्लिक करके दुनिया के किसी भी कोने में मुसलमान द्वारा किए गए अपराध की निंदा कर हम भी जवाबदेही से मुक्त हो जाएंगे. बाकी तो जैसा अमेरिका बहादुर तय करे.
(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 7 Issue 3, Dated 15 February 2015)