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Sunday, February 13, 2011


अल्पसंख्यकवाद की फफूंद छट रही है! 

-- शीबा असलम फ़हमी

"हिन्दुस्तानी जम्हूरियत, संविधान, सियासत, सरकारी मशीनरी, पॉलिसी साज़ी पर सख्त हमलावर रहनेवाले उर्दू अख़बार ख़ुद अपने समाज की दलदल को नज़रंदाज़ करते रहे हैं . मुस्लिम समाज की अंदरूनी ग़ैर-बराबरी, मर्दवादी और औरत मुख़ालिफ़ हरकतों, अतार्किक मज़हब परस्ती, ज़ात-पात की रवादारी, मज़हबी कयादत की ख़ुद-परस्ती, भ्रष्टाचार जैसे मामलों पर ये अख़बार हमेशा ही नरमी बरतते रहे. लेकिन जो समाज अपने गिरेबान में कभी नहीं झांकता और सिर्फ़ दूसरों को ही अपने हालात का ज़िम्मेदार मानता है उसका इलाज नहीं किया जा सकता. अपने पाठकों को सही दिशा ना दिखा कर ये उस चक्रव्यूह का हिस्सा बन गए जिसमें मुल्ला-मीडिया-मुस्लिम सियासी नेतृत्व की तिगड़ी मआशी और ज़हनी दिवालियापन पनपा रही थी"
किसी अर्थशास्त्री का बयान है की 'पूंजीवादी शोषण का शिकार होना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है परन्तु इससे भी ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है उसके द्वारा नज़रंदाज़ कर दिया जाना'. यानी की पूंजीवादी बाज़ारतंत्र जैसी 'पत्थर से पानी निचोडनेवाली' शोषक प्रक्रिया को भी अगर आप में कोई सम्भावना नहीं दिखाई देती तो आप में वाक़ई कुछ नहीं बचा है. हिंदुस्तान में मीडिया को लेकर इस वक़्त जो गर्मागर्म बहस चल रही है उसकी वजह घोर पूंजीवाद के इस दौर में मीडिया में कार्पोरेट संस्कृति, और मीडिया का ख़ुद कार्पोरेट बन जाना है. ज़ाहिर है जनमानस के बीच 'सरोकार', 'मूल्यों', 'जनहित', 'राष्ट्रनिर्माण' और 'लोकतंत्र के सुतून' जैसे शब्दों से जुड़े पेशे में, ये बहस इसलिए नहीं गर्माई है की ये कोई बड़ी अच्छी घटना मानी जा रही है, यक़ीनन आज इसे बेबसी के साथ ही विश्लेषण में शामिल किया जा रहा है. आज अंग्रेज़ी और वेर्नाकुलर मीडिया पर कार्पोरेट शब्द एक कोड़े की तरह पड़ रहा है.
 ऐसे में मैं समयांतर के पाठकों को भारतीय मीडिया के उस हिस्से से मिलवाना चाहती हूँ जो अपने वजूद को बचाने के लिए कार्पोरेट पूँजी को बड़ी आस भरी नज़रों से देख रहा है, क्यूंकि कोर्पोरेट की बुराइयाँ, सीमाएं, और ज़रूरी तक़ाज़ों की ज़द में आने से परहेज़ तो बाद की बात है, इस वक़्त सवाल ये है की ज़िन्दा कैसे रहा जाए? और अगर कोर्पोरेट पूँजी ना आ गई होती तो क्या होता? मैं बात कर रही हूँ हिंदुस्तान में उर्दू-अखबारात के हाल पर.
उर्दू ज़बान की फ़लाह के लिए जो सरकारी-ग़ैर सरकारी इदारे काम कर रहे हैं उनकी महफिलों, सेमिनारों में उर्दूदां अवाम की गिनती 20 करोड़ बताई जाती है. जिस पर ताज्जुब नहीं. और ये भी कि कालांतर में इसे पढ़नेवाले लगभग सभी मुसलमान हैं. इतने बड़े जनसमूह तक पहुँच रखनेवाले 'ज़रिये' को बाज़ार ने क्यों नहीं गर्दाना?
सियासी वजूहात (लसानी नस्लकुशी) अपनी जगह लेकिन इसके बावजूद 20 करोड़ की तादाद कम नहीं होती, और उर्दू के साथ तो यह भी है की 70 की दहाई से ही यह एक इंटरनेशनल ज़बान के तौर पर अपनी जगह बना चुकी है. जिसे कुछ समाजशास्त्री पैन-इस्लामिज़्म से जोड़े बिना नहीं देख सकते. आज ग्लोबलायज़ेशन के दौर में जब वस्तुएं-उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मार्केट किये जाते हैं, उर्दूदां अवाम की तादाद बहुत ही प्रभावशाली आंकड़े बनाती है. इसके बावजूद उर्दू मीडिया में ख़ास कर उर्दू अख़बार बेपनाह पस्त्हाली का शिकार क्यों रहे ये जानना ज़रूरी है.

पिछली कुछ दहाइयों से भारतीय उर्दू अख़बार कुछ ऐसी नोइयत से दो चार रहे जिसमे वो ऐसे भाषाई समूह की नुमायन्दगी कर रहे थे जो की अक्सर दूसरी ज़बानों में शिक्षित नहीं थे. यानी की वो मुसलमान जो की सिर्फ़ हुरूफ़ या अक्षर ज्ञान से वाकिफ़ हैं और जिन्हें बहुत उम्दा तालीम नहीं मिल सकी वह भी उर्दू अख़बार तो पढ़ ही रहा था. इसके अलावा बहुत से ऐसे पाठक उर्दू अख़बारों को मिले जो की मदरसों की पैदावार थे और हिंदी और अंग्रेज़ी में  बहुत सहज नहीं महसूस करते थे. कुल मिला कर उर्दू पाठकों का बहुत बड़ा तबक़ा उनका रहा है जो की आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं थे और शैक्षिक रूप से मात्र उर्दू शनास काहे जा सकते हैं. लेकिन इसके बावजूद ये एक उपभोक्ता वर्ग तो था ही, जो साबुन, तेल, मंजन, आटा, नमक, मसाले, कपडे, जूते, चप्पल, टी वी, फ्रिज, मशीन जैसी उपभोक्ता वस्तुओं का इस्तेमाल तो कर ही रहा था. फिर ऐसा क्यों हुआ की बीस करोड़ उपभोक्ता को नज़रंदाज़ करके बाज़ार आगे बढ़ गया? इस ख़ास सूरतेहाल को समझने के लिए हमें उस सियासी पसेमंज़र पर नज़र डालनी होगी जो आज़ादी के साथ ही शुरू हुआ.

इसमें शायद ही किसी समाजशास्त्री को कोई ना-इत्तेफ़ाकी हो की पाकिस्तान के वजूद ने हिन्दुस्तानी उर्दू के वजूद पर ही सवाल खड़ा कर दिया. आज़ादी के बाद से ही सेकुलर प्राइमरी स्कूलों से उर्दू को रवाना कर दिया गया, जिसका नतीजा यह निकला की स्कूलों से ग़ायब हुई उर्दू सिर्फ़ इस्लामी मदरसों में बची रह गई. एक 'फंक्शनल लैंगुएज' के तौर पर उर्दू के वजूद पर यह जानलेवा साबित हुआ, क्यूंकि, उर्दूदां तबक़े के सामने अपनी औलादों को इस ज़बान से आरास्तां करने का एक ही तरीक़ा बचा की वो लाज़मी तौर पर इस्लामी मदरसे में भेजकर अपने बच्चों को उर्दू सीखाएं. हिंदुस्तान के सबसे बड़े ख़ित्ते की उर्दुदां अवाम को ज़बान के ज़रिये इस तरह कॉर्नर किया गया की उसके सेकुलर क्रीडेनशिअल्स सवालों के घेरे में आ गए (यहाँ मैं हिन्दुस्तानी मदरसों को फ़िरकापरस्ती से नहीं लेकिन हाँ आख़िरतपरस्ती से जरूर जोड़ रही हूँ). दूसरी तरफ़ यह क्राइसिस भी पैदा हो गया कि या तो बच्चे को डॉक्टर-इंजीनयर  बना लो या अपनी ज़बान पढ़ा लो. ख़ैर यह मौज़ूं एक अलग लेख में उठाए जाने चाहिए की किस तरह एक तरफ़ फ़ौज-अदालत-समाजयात और दूसरी तरफ़ इंक़िलाब-बग़ावत-आज़ादी-इश्क़ और सूफ़ियों की बानी यानी 'उर्दू ज़बान' के मुहाफ़िज़ देओबंदी-बरेलवी मदरसे बना दिये गए, जहाँ उन्हें हिंदुस्तानियत से लबरेज़ उर्दू की जगह अरबी-ज़दा दीनी डिस्कोर्स की ज़बान रटाई गई जो की समाजयात, साइंस, हिसाब, और ज़बान में दीनी हवालों से पुर थी और जिसमे मीर और ग़ालिब का अज़ीम उर्दू अदब, जो ख़ालिस सेकुलर अदब था, वह नदारद रहा.
देखिये, उर्दू ज़बान का मामला 20 करोड़ अवाम का मामला है, जिसे 'उर्दू अदब प्रेमियों' के मसले से ना जोड़ा जाए जो की कितना भी हौसला-अफ़ज़ा क्यों ना हो लेकिन बहरहाल एक छोटी सी अदब-प्रेमियों कि तादाद का मामला है, (जिनके लिए बाज़ार/इन्टरनेट ने देवनागरी और रोमन में भी उर्दू-अदब मुहैय्या करवा ही रखा है. उनकी उर्दू स्क्रिप्ट ना सीखने की काहिली की वजह से 20 करोड़ उर्दुदां लोगों की स्क्रिप्ट ख़त्म नहीं की जा सकती).
उर्दू ज़बान के हालात यहाँ तक बिगड़े की कुछ आतंकवादी वारदातों  में उर्दू में रुक्क़े बरामद बताए गए और फिर ज़बान को मुल्ज़िमों की विचारधारा से जोड़ कर इसे आतंकवादियों की कोड-भाषा तक साबित किया गया. जो ज़बान हिंदुस्तान में जन्मी-पली-बढ़ी और परवान चढ़ी वो किस आसानी से हिंदुस्तान दुश्मनों की खिदमतगार साबित कर दी गई, लेकिन किसी ने इस पर कुछ नहीं कहा की आख़िर उर्दू को तिरस्कृत किसने किया? किसने इस खांटी हिन्दुस्तानी ज़बान को  धार्मिक विद्वेष और सियासत के चलते ठुकरा दिया? तो लगातार उर्दू के देश-प्रेम को सवालों के घेरे में रखने से दो बातें हुईं की तक़सीम का इलज़ाम झेल रहा मुस्लिम उर्दुदां तबक़ा मसलहतन ख़ामोश हो गया और ग़ैर मुस्लिम उर्दुदां तबक़े को समझ में आ गया की वक़्त तो अब हिंदी का है लिहाज़ा 'मरी बछिया' को ढोने में क्या फ़ायदा? (हाँ गाहे-बगाहे उर्दू शायरी का सटीक इस्तेमाल ना नेहरुवाले भूले ना आज़ाद्वाले).
जहाँ तक उर्दू अदब का सवाल है तो हिन्दुस्तानी सरकार की इस पुर-तास्सुब हरकत ने उन उर्दू-प्रेमी ग़ैर-मुस्लिमों से भी उर्दू सीखने का मौक़ा और हिम्मत छीन ली जो ज़बान के मामले में सेहतमंद सोच रखते थे कि ज़बान तो बहरहाल एक ज़रिया है ख़यालात के तबादले का, फैलाव का, ना की किसी ख़ास दीन-मज़हब-पंथ-गुट की बपौती. और उर्दू अदब से इश्क़ करनेवाले मुसलमान और हिन्दू दोनों ही बेचारे यतीम हो गए, क्यूंकि मदरसों में उनके लिए कुछ था नहीं,और स्कूलों में उनकी उर्दू थी नहीं, तो वह कहां जाते? हाँ, एक अजब-ग़ज़ब इंतज़ाम ज़रूर रहा हमेशा, वो ये की आला तालीम के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज़रूर उर्दू अदब एक 'विषय' के तौर पर जारी रहा. तालीम के घामड़ पालिसी-साज़ों को पता नहीं कैसे ये यक़ीन था की दीनी मदरसों के फ़ारिग तालिबेइल्म अचानक मीर, सौदा, ग़ालिब, फ़ैज़, साहिर, जोश वगैरा के आशिक हो जाएँगे. लेकिन हुआ ये की इस्लाम या दीन की बाक़ायदा आला तालीम हासिल करने के लिए 'इस्लामिक स्टडीज़' के शोबे तो बहुत बाद की कहानी हैं, पहले तो मदरसों वालों को सिर्फ़ और सिर्फ़ 'शोबा-ए-उर्दू अदब' से ही गुज़ारा करना था.
ख़ैर! कहने का मक़सद यह कि उर्दू कि नई पौध सेकुलर स्कूलों से नहीं, बल्कि दीनी-मज़हबी मदरसों से निकलने लगी, जिसके नज़रिए और डिस्कोर्स दोनों ही 8 -9 साल कि दीनी-मदरसे की तालीम द्वारा एक ख़ास सिम्त में रवां-दवां कर दिए गए थे. इन्ही लोगों ने आगे जा कर मुख्तलिफ़ यूनीवरसिटी के उर्दू डिपार्टमेंटों को आबाद किया. (हालाँकि कुछ तादाद उन तुलबा कि भी रही जो किसी तरह अपने वालदैन या माहौल की बदौलत बिना मदरसे गए कुछ बुनियादी उर्दू सीख कर आ गए, इसमें भी घरेलू दीनी-तालीम का बड़ा हाथ रहा, ख़ास कर लड़कियों के हवाले से ये बात और भी सटीक है.) कुल मिला कर आप समझ गए होंगे की अब, उर्दू में बी ए, एम ए, एम फ़िल, और पी एच डी जैसी डिग्रियों से लैस ये नौजवान, अक्सर किस बैक ग्राउंड से आ रहे हैं.
अब आइये उर्दू अख़बारों के हाल पर जो इस लेख का असल मौज़ूं है. हिंदुस्तान के उर्दू अख़बारों में इस वक़्त ज़्यादातर मुस्लिम सहाफ़ी मदरसे के बैक ग्राउंड से ही हैं. उनमे से कुछ ने सहाफ़त का कोर्स किया है, कुछ ने वो भी नहीं किया. एक तरफ़ हिन्दुस्तानी समाज में हिंदुत्वा फिरक़ावारियत का बढ़ना, रोज़ रोज़ के दंगे-फ़साद, पुलिस/पी ए सी के ज़ुल्म, बाबरी मस्जिद की शहादत, और गुजरात में मुस्लिम नस्लकुशी के फ़ौरन बाद के दौर में,  मदरसा बैक ग्राउंड से आए सहाफ़ियों ने जिस फिरक़ावारियत से रंगे हालात में सहाफ़त शुरू की उसके लिए तो समाजयात के माहिरीन की ज़रुरत थी ना की आख़िरत की फ़िक्र में इस दुनिया में वक़्त काटते मज़हबी आलिम की? लिहाज़ा उर्दू सहाफ़त पर अक्सर मज़हबी कयादत और तंज़ीमों का दौर हावी होता चला गया. सरकारी तास्सुब पर, आर एस एस की घिनौनी साज़िशों पर, तथाकथित इस्लामी दहशतगर्दी के फ़ोबिया पर, मुसलमानों की तालीमी-मआशी पस्त'हाली पर चीख़ती सुर्ख़ियों का एक लम्बा दौर रहा उर्दू सहाफ़त में. कौम की जिस पस्त'हाली पर आंसू बहाए जा रहे थे उससे उबरने के लिए सियासी-समाजी माहिरीन की ज़रुरत उस वक़्त शिददत से पेश आई और सदी की आखरी दहाई से इनका दख़ल  होने भी लगा.
उर्दू अख़बार के मालिकान जो की अक्सर एडिटर भी होते हैं उन्होंने भी सियासी-समाजी पस्त'हाली को कैश कर उर्दू रीडरशिप को बढ़ाने की कोशिश की जबकि बीसवीं सदी के शुरूआती दौर में ऐसे उर्दू अख़बारों की लम्बी फ़ेहरिस्त है जो बहोत सेहतमंद और प्रगतिशील नज़रियों से सहाफ़त कर रहे थे. उर्दू अख़बारों में फिरक़ावारियत और घेट्टो मानसिकता आसान कामयाबी की तलाश का भी नतीजा रही. उर्दू अख़बारों में रीडरशिप बढ़ाने की होड़ ने अपने रीडर का बड़ा नुकसान किया. एक ऐसा शख्स जो तालीमी तौर से कमज़ोर था, जिसकी सोच को सेहतमंद और प्रोग्रेसिव बनाने के दूसरे सभी तरीक़े उसकी ज़द से छूट गए थे, पढ़ने के नाम पर वह सस्ते उर्दू अख़बार और रिसालों से ही जुड़ा रह गया था, ऐसे शख्स की सेहतमंद तरबियत उर्दू अखब़ार कर सकते थे, की अपने यहाँ प्रोग्रेसिव और इन्क्लुसिव सामग्री परोस कर काफ़ी हद तक नज़रयाती और क़ौमी समझ में सुधार ला सकते थे. अपने पाठक के सामने एक प्रोग्रेसिव, दूसरे कल्चर की अच्छाइयों को अपनानेवाला, अपने समाज के मज़लूमों (औरतें, अर्ज़ाल, अज्लाफ़, पसमांदा) की बात उठाने वाला और अल्हाय्दगी-पसंद रवैयों पर रोक लगानेवाला लेखन पेश कर के बेहतर शहरी तरबियत दी जानी चाहिए थी. लेकिन कुछ दौर ऐसा था, कुछ अख़बार मालिकों की समझ ऐसी थी की उर्दू अख़बार अल्पसंख्यकवाद की ज़हनियत को ही बेचनेलगे और उनका लहजा एक नाराज़, चिढ़चिढ़े, शिकायती और पस्त ज़हेनवाले इंसान का लगने लगा. हिन्दुस्तानी जम्हूरियत, आईन, सियासत, सरकारी मशीनरी, पॉलिसी साज़ी पर सख्त हमलावर रहनेवाले ये अख़बार ख़ुद अपने समाज की दलदल को नज़रंदाज़ करते रहे. मुस्लिम समाज की अंदरूनी ग़ैर-बराबरी, मर्दवादी और औरत मुख़ालिफ़ हरकतों, अतार्किक मज़हब परस्ती, ज़ात-पात की रवादारी, मज़हबी कयादत की ख़ुद-परस्ती, भ्रष्टाचार जैसे मामलों पर ये अख़बार हमेशा ही नरमी बरतते रहे. लेकिन जो समाज अपने गिरेबान में कभी नहीं झांकता और सिर्फ़ दूसरों को ही अपने हालात का ज़िम्मेदार मानता है उसका इलाज नहीं किया जा सकता. अपने पाठकों को सही दिशा ना दिखा कर ये उस चक्रव्यूह का हिस्सा बन गए जिसमें मुल्ला-मीडिया-मुस्लिम सियासी नेतृत्व की तिगड़ी मआशी और ज़हनी दिवालियापन पनपा रही थी. इस गठजोड़ से वही तबक़ा नुकसान में रहा जो की कम हैसियत और कम पढ़ा-लिखा था, मतलब ये की जिसे सबसे ज़्यादा रौशनी की ज़रुरत थी उसी को अँधेरी भूल-भुलैयां में उलझाया जा रहा था जबकि इनके हैसियतमंद मुसलमान भाई-बंधू सेकुलर तालीम हासिल कर डॉक्टर, इंजीनियर, अफ़सर बन कर सामान्य ज़िन्दिगी जी रहे थे.
  हाल में पड़ोसी मुल्क पकिस्तान में कुफ़्र क़ानून को लेकर जो हालात चल रहे हैं और ख़ास कर शहीद गवर्नर सलमान तासीर के क़त्ल के बाद से, उन कानूनों को लेकर पूरे उपमहाद्वीप में जो बहेस छिड़ी उस में भी देखने में आया की सलमान तासीर के क़त्ल की मज़म्मत तो उर्दू अख़बारों ने की लेकिन इन काले कानूनों पर, जो सिर्फ़ अपने कमज़ोरों को औक़ात में रखने के काम लाए जा रहे हैं, पर सही सिम्त में बात नहीं की गई. कुछ अख़बार तो सलमान तासीर को  ग़ैर-ज़िम्मेदाराना सियासत और कानूनी मामले में दखलंदाज़ी  का कुसूरवार भी ठहरा रहे थे. इन्हें लग रहा था की क़त्ल के गुनाह की निशानदेही करना ही काफ़ी है. जबकि असली मामला तो ये है की मुस्लिम समाज अपने अल्पसंख्यकों के साथ कैसा सुलूक करते हैं इस पर बात होनी चाहिए थी. एक पड़ोसी मुस्लिम मुल्क में लगातार इसाई, हिन्दू, पारसी, क़ाद्यानी और शिया लोगों के साथ ताक़त का खेल खेला जा रहा है. ख़ुद हिंदुस्तान में हर मौक़े पर सियासत और समाज को क़ानून की बराबरी, क़ानून का राज, हक़ और इंसाफ़ की चिंघाडती हुई सुर्खियाँ और तहरीर लगाने वाले उर्दू अख़बार पाकिस्तान के खतरनाक काले क़ानून पर साफ़ और खुल कर बात नहीं कर रहे. जबकि हिंदुस्तान का मुस्लिम बुद्धिजीवी समाज खुल कर इनकी मुखाल्फ़त कर रहा है. लेकिन अख़बार इसलिए साफ़ बात नहीं कह रहे की उन्हें तो अपनी उसी रीडरशिप का भला बने रहना है जो इनकी ख़ास शैली की आदि है. इन सब हालात के मद्देनज़र कॉर्पोरेट दुनिया का इस तरफ़ ध्यान देना उम्मीद की किरण दिखाता है की मज़हबी ज़हनियत के बजाय उर्दू सहाफ़त एक प्रोफ़ेशनल महारत और नज़रिए से होने लगे तो उन पीछे ले जाने वाले रुझानों से निजात मिले जिनसे सिर्फ़ मज़लूमियत और मिस्कीनियत पनपती है. मैं इस पूरे विमर्श से उन चंद-एक उर्दू अख़बारों के नाम अलग रखती हूँ जिन्होंने हमेशा एक सेहतमंद सोच ही पेश की, ख़ास कर दक्षिण भारत, मुंबई से निकलनेवाले और दिल्ली में ' डेली सहाफ़त' जैसे अख़बार जो ख़ुद को इन बिमारियों से बचा कर रख सके हैं.
 हम जानते हैं की इस्लामी-दीनी तालीम में जिस डिस्कोर्स में बात होती है वो इस दुनिया के बजाय मरने के बाद की, यानी आख़िरत की दुनिया को सँवारने में ज़्यादा दिलचस्पी रखता है, और इसके लिए वह ना सिर्फ़ अपनी ज़िन्दिगी बे-रंग किये रहता है बल्कि किसी और की ज़िन्दिगी को भी बे-रंग करना अपना मज़हबी फ़र्ज़ समझता है. ऐसी तालीमयाफ़्ता जमात भला मार्केट और कस्टमर के रिश्ते पर लानत ही भेजेगी नाकी उसे अपनाने-रिझाने के तौर तरीक़े निकालेगी. वह तो इस पर फ़ख्र करेगी की चाहें जो हो जाए हमने मदरसों में मशरिकी लानत यानी पूँजी को घुसने नहीं दिया और यही हम उर्दू अख़बार में भी कर के दिखाएँगे. लेकिन मीडिया तो एक पेशा है और उन्ही शर्तों पर चलता है जिसे हम 'लागत को मुनाफे' में तब्दील होने के तौर पर जानते हैं. बाज़ार और पूंजीवाद की पैदा बहुत संजीदा विकृतियाँ है इसमें कोई शक नहीं, और इस पर भी ताजुब नहीं की किसी दिन यह पूँजी भी मज़हबी तंगनज़री और अल्पसंख्यकवाद को अपने लिए इस्तेमाल करने लगे. इसके लिए भी उर्दूवालों को होशियार रहना होगा क्यूंकि टी वी चैनलों में हिन्दू समाज के हवाले से ये अब आम बात है. लेकिन उर्दू मीडिया अभी उस चकाचौंध से दूर है, लिहाज़ा उसपर बात फिर कभी. लेकिन पेड-न्यूज़ की संस्कृति उर्दू मीडिया में पहले से ही रही है फ़र्क़ सिर्फ़ यह है की पेमेंट करनेवाले हाथ पूंजीपति के ना हो कर सामंती होते थे और उनकी साज़िशें भी सिर्फ़ कौम की अंदरूनी सियासत तक सीमित रही हैं.
इक्कीसवीं सदी की शुरुआत उर्दू सहाफ़त के लिए इस लिहाज़ से बेहतर रही है की अब उर्दू अखब़ार और उर्दू चैनल सिर्फ़ मुसलमान मालिकों का क्षेत्र नहीं है. ई टी वी उर्दू, ज़ी टी वी सलाम, आलमी सहारा, डी डी उर्दू, यू एन आई उर्दू जैसे चैनल और चौथी दुनिया जैसे अख़बार अब कहीं ग़नीमत मीडिया हैं जो उर्दुदां हलक़ों तक हर मौज़ूं, हर मसले और हर क्षेत्र की जानकारियां पहुंचा रहे हैं. इसमें सियासत के अलावा, समाजयात, पर्यावरण, अंतरिक्ष, इन्फोर्मशन टेक्नोलोजी, मनोरंजन जगत, सेहत और चिकित्सा, मनोविज्ञान, और दुनिया भर के मुख्तलिफ़ कल्चर से जुड़ी जानकारियां शामिल की जा रही  हैं. इन इदारों में लिखनेवालों की पहचान भी सिर्फ़ एक मज़हबी ग्रुप से ना हो कर हिंदुस्तान के बहुसंख्यक वर्ग से है.साथ ही अनुवाद, ट्रांसलिटरेशन , न्यूज़ एजेंसियों की खिदमात के ज़रिये अब बहुत विविधता दिखाई दे रही है उर्दू मीडिया में भी.
आज के दौर में मीडिया एक ज़रूरी ज़रिया है अवाम तक पहुँचने का. आज के समाज का इसके बिना काम नहीं चल सकता. उर्दू मीडिया में कॉर्पोरेट सेक्टर के आने से बेहतर हालात बने हैं, हालाँकि हर वक़्त चौक्कन्ना रहने की ज़रुरत है क्यूंकि कॉर्पोरेट पूँजी सिर्फ़ अपना भला देखती है, उसके कोई समाजी सरोकार नहीं होते, इसके बावजूद यह एक ज़रूरी दौर है जिसके आने के बाद ही इसके अगले चरण में दाख़िल हुआ जा सकता है. क्यूंकि जब पूरा देश एक कस्टमर (उपभोक्ता) के तौर पर 'केयर'  के मज़े ले रहा हो तो एक हिस्सा घिसट कर की सही उस का हिस्सा बन रहा है. जैसा की मार्क्स हमें बताता है की सामंतवाद की बेगार और ग़ुलामी से  से छुटकरा पाने  के लिए पूंजीवाद, जिसने मज़दूर की मेहनत के दाम लगाए, एक ज़रूरी मरहला है जिसके बाद ही आगे बढ़ा जा सकता है. उर्दू सहाफ़ियों को वक़्त पर और हक़ बराबर तन्ख्वाह मिलने लगे, एक कारिंदे के तौर पर उसके कुछ हक़ हों इदारे पर, वो इस नौकरी में दो वक़्त इज्ज़त की रोटी खा सके, मआशी दबाव में किसी मौलाना, किसी जमात/जमियत का पैरोकार ना बन कर सही रिपोर्टिंग कर सके तो कितना अच्छा हो. तो देर ही से सही लेकिन पूँजी की नागाहे-करम इस वक़्त उर्दू सहाफ़त को रास आ रही है और उसे सेहत बख्श रही है, जिस पर देर से अल्पसंख्यकवाद की फफूंद उगी हुई थी. लिहाज़ा हिन्दुस्तानी उर्दू सहाफ़त फ़िलहाल खुश है की पूँजी ने उसे किसी लायक़ तो समझा.
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Sheeba Aslam
Research Scholar (PhD),
Centre for Political Studies,
School of Social Sciences
Jawaharlal Nehru University,


ये 'शाही' क्या होता है?

शीबा असलम फ़हमी 

अहमद बुख़ारी द्वारा लखनऊ की प्रेस वार्ता में एक नागरिक-पत्रकार के ऊपर किये गए हमले के बाद कुछ बहुत ज़रूरी सवाल सर उठा रहे हैं. एक नहीं ये कई बार हुआ है की अहमद बुख़ारी व उनके परिवार ने देश के क़ानून को सरेआम ठेंगे पे रखा और उस पर वो व्यापक बहेस नहीं छिड़ी जो ज़रूरी थी. या तो वे ऐसे मामूली इंसान होते जिनको मीडिया गर्दानता ही नहीं तो समझ में आता था, लेकिन बुख़ारी की प्रेस कांफ्रेंस में कौन सा पत्रकार नहीं जाता? इसलिए वे मीडिया के ख़ास तो हैं ही. फिर उनके सार्वजनिक दुराचरण पर ये मौन कैसा और क्यों? कहीं आपकी समझ ये तो नहीं की ऐसा कर के आप 'बेचारे दबे-कुचले मुसलमानों' को कोई रिआयत दे रहे हैं? नहीं भई! बुख़ारी के आपराधिक आचरण पर सवाल उठा कर भारत के मुस्लिम समाज पर आप बड़ा एहसान ही करेंगे इसलिए जो ज़रूरी है वो कीजिये ताकि आइन्दा वो ऐसी फूहड़, दम्भी और आपराधिक प्रतिक्रिया से भी बचें और मुस्लिम समाज पर उनकी बदतमीज़ी का ठीकरा कोई ना फोड़ सके.
इसी बहाने कुछ और बातें भी; भारतीय मीडिया अरसे से बिना सोचे-समझे इमाम बुखारी के नाम के आगे 'शाही' शब्द का इस्तेमाल करता आ रहा है. भारत एक लोकतंत्र है, यहाँ जो भी 'शाही' या 'रजा-महाराजा' था वो अपनी सारी वैधानिकता दशकों पहले खो चुका है. आज़ाद भारत में किसी को 'शाही' या 'राजा' या 'महाराजा' कहना-मानना संविधान की आत्मा के विरुद्ध है. अगर अहमद बुखारी ने कोई महान काम किया भी होता तब भी 'शाही' शब्द के वे हकदार नहीं इस आज़ाद भारत में. और पिता से पुत्र को मस्जिद की सत्ता हस्तांतरण का ये सार्वजनिक नाटक जिसे वे (पिता द्वारा पुत्र की) 'दस्तारबंदी' कहते हैं, भी भारतीय लोकतंत्र को सीधा-सीधा चैलेंज है.
रही बात बुख़ारी बंधुओं के आचरण की तो याद कीजिये की क्या इस शख्स से जुड़ी कोई अच्छी ख़बर-घटना या बात आपने कभी सुनी? इस पूरे परिवार की ख्याति मुसलमानों के वोट का सौदा करने के अलावा और क्या है? अच्छी बात ये है की जिस किसी पार्टी या प्रत्याशी को वोट देने की अपील इन बुख़ारी-बंधुओं ने की, उन्हें ही मुस्लिम वोटर ने हरा दिया. मुस्लिम मानस एक परिपक्व समूह है. हमारे लोकतंत्र के लिए ये शुभ संकेत है.लेकिन पता नहीं ये बात भाजपा जैसी पार्टियों को क्यों समझ में नहीं आती ? वे समझती हैं की 'गुजरात का पाप' वो 'बुख़ारी से डील' कर के धो सकती हैं.
एक बड़ी त्रासदी ये है की दिल्ली की जामा मस्जिद जो भारत की सांस्कृतिक धरोहर है और एक ज़िन्दा इमारत जो अपने मक़सद को आज भी अंजाम दे रही है. इसे हर हालत में भारतीय पुरातत्व विभाग के ज़ेरे-एहतेमाम काम करना चाहिए था, जैसे सफदरजंग का मकबरा है जहाँ नमाज़ भी होती है. क्यूंकि एक प्राचीन निर्माण के तौर पर जामा मस्जिद इस देश के अवाम की धरोहर है, ना की सिर्फ़ मुसलमानों की. मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने इसे केवल मुसलमानों के चंदे से नहीं बनाया था बल्कि देश का राजकीय धन इसमें लगा था और इसके निर्माण में हिन्दू-मुस्लिम दोनों मज़दूरों का पसीना बहा है और श्रम दान हुआ है. इसलिए इसका रख-रखाव, सुरक्षा और इससे होनेवाली आमदनी पर सरकारी ज़िम्मेदारी होनी चाहिए. ना की एक व्यक्तिगत परिवार की? लेकिन पार्टियां ख़ुद भी चाहती हैं की चुनावों के दौरान बिना किसी बड़े विकासोन्मुख आश्वासन के, केवल एक तथाकथित परिवार को साध कर वे पूरा मुस्लिम वोट अपनी झोली में डाल लें. एक पुरानी मस्जिद से ज़्यादा बड़ी क़ीमत है 'मुस्लिम वोट' की, इसलिए वे बुख़ारी जैसों के प्रति उदार हैं ना की गुजरात हिंसा पीड़ितों के रेफ़ुजी केम्पों से घर वापसी पर या बाटला-हाउज़ जैसे फ़र्ज़ी मुठभेढ़ की न्यायिक जांच में!
ये हमारी सरकारों की ही कमी है की वह एक राष्ट्रीय धरोहर को एक सामंतवादी, लालची और शोषक परिवार के अधीन रहने दे रहे हैं. एक प्राचीन शानदार इमारत और उसके संपूर्ण परिसर को इस परिवार ने अपनी निजी मिलकियत बना रखा है और धृष्टता ये की उस परिसर में अपने निजी आलिशान मकान भी बना डाले और उसके बाग़ और विशाल सहेन को भी अपने निजी मकान की चहार-दिवारी के अन्दर ले कर उसे निजी गार्डेन की शक्ल दे दी. यही नहीं परिसर के अन्दर मौजूद DDA/MCD पार्कों को भी हथिया लिया जिस पर इलाक़े के बच्चों का हक़ था. लेकिन प्रशासन/जामा मस्जिद थाने की नाक के नीचे ये सब होता रहा और सरकार ख़ामोश रही. जिसके चलते ये एक अतिरिक्त-सत्ता चलाने में कामयाब हो रहे हैं. इससे मुस्लिम समाज का ही नुक्सान होता है की एक तरफ़ वो स्थानीय स्तर पर इनकी भू-माफिया वा आपराधिक गतिविधियों का शिकार हैं, तो दूसरी तरफ़ इनकी गुंडा-गर्दी को बर्दाश्त करने पर, पूरे मुस्लिम समाज के तुष्टिकरण से जोड़ कर दूसरा पक्ष मुस्लिम कौम को ताने मारने को आज़ाद हो जाता है.
बुख़ारी परिवार किसी भी तरह की ऐसी गतिविधि, संस्थान, कार्यक्रम, आयोजन, या कार्य से नहीं जुड़ा है जिससे मुसलामानों का या समाज के किसी भी हिस्से का कोई भला हो. ना तालीम से, ना सशक्तिकरण से, ना हिन्दू-मुस्लिम समरसता से, ना और किसी भलाई के काम से इन बेचारों का कोई मतलब-वास्ता.... तो ये काहे के मुस्लिम नेता?
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(columnist-writer)
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय दिल्ली में शोध.


अगली बार जब स्त्री-विमर्श सूझे ! --

 शीबा असलम फ़हमी

याद कीजिये, क्या अपने कभी आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को किसी बड़े आन्दोलन या सामाजिक बदलाव का नेतृत्व करते देखा है? राजा राम मोहन राय,बाल गंगाधर तिलक, सर सैयद अहमद खान, भीमराव अम्बेडकर,छत्रपति शाहूजी महाराज,ज्योतिबा फुले, मोहनदास करमचंद गाँधी, कांशीराम या महिलाओं में रज़िया सुल्तान,लक्ष्मीबाई, चाँद बीबी, सावित्रीबाई फुले,पंडिता रामाबाई,रकमाबाई, बेगम भोपाल, ज़ीनत महल - कौन थे ये लोग ? ग़रीब-गुरबा? नहीं!

सीधी सी बात है, समाज से भिड़ने के लिए और उसके दबाव को झेलने के लिए जो आर्थिक मज़बूती चाहिए, अगर वह नहीं है तो आपकी सारी 'क्रांति' जिंदा रहने की जुगत के हवाले हो जाती है.खुद को संभाल न पाने वाला इन्सान कैसे किसी आर्थिक-सामाजिक विरोध और असहयोग को झेलकर समाज से टकराएगा ? एक निराश्रित, भूखे, कमजोर से यह उम्मीद कि वह क्रांति की अलख जगाकर परिस्थितियां बदल दे, निहायत मासूमाना मुतालबा है. लेकिन इस मामले को अगर आप स्त्री-विमर्श के हवाले से समझें तो परत-दर-परत एक गहरी होशियारी और आत्मलोभ का कच्चा चिठ्ठा खुलने लगता है.

कौन नहीं जनता कि संपत्ति में बंटवारे को लेकर समाज कितना पुरुषवादी है. बेटियों को हिस्सा देने के नाम पर क़ानूनी बारीकियों के जरिये ख़ुद को फायदे में रखने की ख़ातिर कितने वकीलों-जजों को रोजगार मुहैया कराया जा रहा है और बेटी का 'हिस्सा' तिल-तिल कर दबाया जा रहा है.
इसके बरक्स अगर आप पुरुषों के विमर्श और साहित्य की दुनिया पर नज़र डालें तो शायद ही कोई हो जो यह न मानता हो कि महिलाओं को सशक्तिकरण की ज़रूरत है. जो महिलावादी विमर्श-लेखन में नहीं हैं वे भी और जो बाज़ाब्ता झंडा उठाये हैं वे तो ख़ैर मानते ही हैं कि समाज में औरतों की हालत पतली है.
आजकल तो पुरुषों द्वारा कविता-कहानी के ज़रिये भी स्त्रियों की दयनीयता को महसूसने की कवायद शुरू हो चुकी है.ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि इनसे कहा जाय कि ज़रा आत्मावलोकन करें.अब इस लेखन और स्त्री आन्दोलन में पुरुष सहयोग की भागीदारी उस स्तर पर है कि जिम्मेदारी भी डाली जाय. पिछले तीन-चार सालों से जब से महिला विषयक लेखन से जुड़ी हूँ, तब से ही कुछ ख़ास तरह के साहित्य और विमर्श से दो-चार हूँ. अक्सर तो लेखक-प्रकाशक टिप्पड़ी-समीक्षा के लिए किताबें भेज देते हैं. कुछ इन्टरनेट लिंक और साफ्ट कापी आदि भी आती रही है,जिनमें अक्सर कविताएँ मिलीं जो स्त्री और स्त्री-चरित्रों का आह्वान करती हैं. पिछले लगभग एक साल से ऐसे निजी और सामुदायिक ब्लॉगों की भी भरमार हैजिनमें स्त्री-केन्द्रित कविता-कहानी-विमर्श छाया हुआ है. कुछ कविताएँ अपपनी माँ, नानी, दादी वगैरह को मुखातिब हैं उनकी ज़िन्दगी के उन पहलुओं और हादसों को याद करती हैं जब उन्हें सिर्फ़ बेटी, बहू, माँ, बहन समझा गया, लेकिन इन्सान नहीं. जो ख़ानदान में तयशुदा किरदारों में ढल गयीं और भूल गयीं कि वे अपने आप में एक इन्सान भी हैं. जिनके होने से परिवार-खानदान की कई जिंदगियां तो संवर गईं लेकिन खुद उनका वज़ूद मिट गया. कुछ और इसी तरह के स्त्री-विमर्श पर नज़र डालूं तो,पुरुष-लेखकों का एक और वर्ग है जो अनुभूति के स्तर पर 'स्त्री-मन' में प्रवेश कर, वहाँ उतर जाता है जहाँ से वे खुद औरत बनकर दुनिया देख रहे हैं. उनके भीतर की स्त्री के नजरियों को लेखनी में उतरना और फिर उन बारीकियों को आत्मसात करना.
एक और मिज़ाज है स्त्री-केन्द्रित लेखनी का,जो विमर्श-विश्लेषण द्वारा महिलाओं को बराबरी-इंसाफ़ और हक़ हासिल करने के लिए हांक लगाता है. वहाँ आह्वान के साथ-साथ धिक्कार भी है जो औरत के संकोच, बुज़दिली,धर्मभीरुता,संस्कारी और शुशील बर्ताव को छोड़, आग-ज्वाला बनने का आह्वान करता है, और इसके अभाव को स्त्री की 'गुलामी की मनोदशा' का प्रतीक मानता है.
साहित्य बिरादरी में तो स्त्री-देह को लेकर जो कुछ चल रहा है उस पर सिर्फ़ यही कह कर बात ख़त्म करुँगी कि दैहिक मुक्ति मात्र से सारी दुनिया में स्त्रीवादी क्रांति का सपना देखना अजीब लगता है. और बात जब वेशभूषा, पर्दा-प्रथा या संस्कृति पर आकर टिक जाती है तो और भी सतही हो जाती है. पुरुषों द्वारा इस तरह के स्त्री-विमर्श में भाषणबाजी के तौर पर वह सब कुछ है जो कि हम किसी प्रतिक्रियावादी विमर्श में देखते हैं.और जिसे अंग्रेजी में 'लिप-सर्विस' कहा जाता है, बस.
लेकिन इस हमदर्दी-भरे लेखन-विमर्श और विश्लेषण में ईमानदारी की बेहद कमी है जो किसी से ढंकी-छुपी नहीं है.और जिन पर पुरुष-समाज की मौन स्वीकृति जारी है और जो महिला-सबलीकरण में सबसे बड़ी बाधा है.
महिलाओं की दुर्दशा पर द्रवित साहित्य रचने वालों से लेकर,ठोस, विचारोत्तेजक और रेडिकल विमर्श करने वालों से भी यह पूछा जाना ज़रूरी हो गया है कि वह साहित्य कब रचा जायेगा जिसमें पति,पिता,भाई,पुत्र,पौत्र के असली किरदार उतरेंगें कि कैसे उनके पिता उनकी माँ के साथ खुलकर वह सब करते रहे जिससे वे दया की निरीह पात्र बनती गईं? कैसे उनके दादा-नाना-ताया का रौब-दाब कायम होता रहा? कैसे वे खुद पति के रूप में अपने पूर्वजों का अगला संस्करण बने हुए हैं? आज समाज में जिन स्रोतों से ताकत, सम्मान, आत्मविश्वास हासिल किया जाता है,स्त्री को भी ज़रूरत उन्हीं की है न की दैहिक चिंतन के चक्रव्यूह में फंसकर असली मुद्दों से भटकने की.
जो पुरुष-समाज स्त्री-मुक्ति-विमर्श में शामिल है, उनसे दो टूक सवाल है कि पिता-भाई के रूप में क्या आपने अपनी बेटी और बहन को परिवार की जायदाद में हिस्सा दिया या कन्नी काट गए? अगर पिता-भाई के रूप में पुरुष ईमानदार और न्यायप्रिय नहीं है तो उनकी बेटियां-बहनें अबलायें ही बनी रहेंगीं. पति-ससुराल और समाज में हैसियत-हीन बनने की प्रक्रिया मायके से ही शुरू होती है जब--
(1) विवेकशील होने के लिए शिक्षा नहीं मिलती.
(2) आत्मविश्वासी होने के लिए आज़ादी नहीं मिलती.
(3) आत्मनिर्भर होने के लिए परिवार-पिता की जायदाद में हक़ बराबर हिस्सा नहीं मिलता.
ये तीनों धन बेटियों को पीहर में मिलने चाहिए. अगर औरत इनसे लैस है तो ससुराल-पति क्या पूरे समाज के आगे ससम्मान ज़िन्दगी तय है लेकिन अगर पिता ही ने उसे इनके अभाव में अपाहिज बना दिया है तो क्या मायका, क्या ससुराल और क्या बाहर की दुनिया- सभी जगह उसे समझौते ही करने हैं और आत्मसम्मान, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता पर कितने ही प्रवचन उसका कोई भला नहीं कर सकते.
साहित्य-जगत में स्त्री-सबलीकरण पर आप अगली बार जब भी सोचें, कृपया यहीं से सोचें कि खुद आपने अपनी बेटी-बहन-पत्नी को परिवार की संपत्ति में 'हक़ बराबर' हिस्सा दिया क्या? क्योंकि मध्यवर्ग में स्त्री-शिक्षा पर चेतना तो कमोबेश आ गयी है, दूसरी तरफ सरकारी नीतियों की वजह से भी लड़कियों की शिक्षा आगे बढ़ी है लेकिन मर्द की जहाँ अपनी ताक़त-हैसियत में निजी स्तर पर भागीदारी की बात आती है, वह सरासर मुजरिम की भूमिका में है. तब वह दहेज़,भात, नेग आदि कुरीतियों की आड़ में छुपकर मिमियाता है कि हम बहन-बेटी को ज़िन्दगी भर देते ही हैं. बेटी को दहेज़-भात-नेग में टरकाने वाले यह सब खुद रख लें अपने लिए और जो अपने लिए जायदाद दबा रखी है वह बेटियों-बहनों को दे दें तो चलेगा? क्या वे इस अदला-बदली को तैयार होंगें?
एक और पलायनवादी तर्क यह आता है कि बेटी-बहन को तो ससुराल से भी मिलता है. यह सबसे कुटिल तर्क देते समय वे यह नहीं सोचते कि जब तुम खुद अपने खून, अपनी औलाद को नहीं दे रहे हो तो पराये लोग जो दहेज के बदले उसे ले गए, वह उसके नाम अपनी जायदाद लिखवायेंगें ? या ऐसे पिता-भाई खुद अपनी पत्नियों के नाम जायदाद का कितना हिस्सा चढ़वाते हैं कागज़ों पर?
जिस दिन बेटी के पास पलटकर वापस आने का संबल अपना 'घर' होगा जिस दिन डोली-अर्थी के चक्रव्यूह से वह मुक्त होगी, जिस दिन बुरे वक़्त में संबल बनने के लिए रिश्ते और संसाधन होंगे, उसी दिन से बहुएं-पत्नियाँ आत्मसम्मानी, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर होंगी.
सवाल यह है कि अपने इस वाजिब हक़ को लेने के लिए प्रेरित करनेवाला न साहित्य है कहीं,न विमर्श, क्योंकि यह किसी सरकारी नीति में हिस्सेदारी का मामला नहीं है, न ही किसी दूसरे की बहन-बेटी को ' स्त्री-देह' की मानसिक जकड़न से मुक्त करवाकर स्वान्तः सुखाय भोग का मामला, इसमें तो खुद अपनी अंटी ढ़ीली करनी पड़ती है, और बैठे-बिठाये बाप की जायदाद से मिलने वाले सुख-संतोष-सुरक्षा से हाथ धोना पड़ता है.
लिहाज़ा इस पर सर्वत्र मौन सधा हुआ है और बहस इस पर जारी है की किस तरह स्त्रियाँ ख्वामख्वाह अपने शारीर के प्रति अत्यधिक सतर्क होकर गुलामी में जकड़ी हुई हैं, कैसे वे शुचितावादी धार्मिक-सांस्कृतिक परम्पराओं को धोकर जीवन-सुख से खुद को वंचित कर रही हैं. कैसे वे समाज की तयशुदा भूमिकाओं में फंसकर रह गयी हैं और एक स्वछंद स्त्री होने के सुख से वंचित हैं.कुल मिलकर वह सारा स्त्री-विमर्श जारी है जिससे खुद मर्द किसी तरह के घाटे में नहीं हैं. वह परिवार की संपत्ति पर, सारे अधिकारों पर और सत्ता पर एकछत्र राजा बना बैठा है. उसकी सत्ता पर कहीं से आंच नहीं आ रही है. वह कमजोर,अधिकारहीन, विवेकहीन, आत्मविश्वासहीन, सम्पत्तिहीन महिलाओं (बेटी, बहन,पत्नी, माँ,रखैल) से घिरा हुआ, खुद को निर्विघ्न सत्ता में बनाये हुए है. और समाज में न्यायप्रिय, आधुनिक प्रगतिशील, स्त्रीवादी दिखने के लिए वह सभी फैशनेबल सिद्धांतों-वादों को अपनी वाणी में आत्मसात कर समय-सम्मत उवाच करता है.
ऐसी सूरत में सिमोन द बाउवार से लेकर प्रभा खेतान तक, और तसलीमा नसरीन से मैत्रेयी पुष्पा तक जो भी समर्थन स्त्री-विमर्श के नाम पर आप दे रहे हैं वह गल-थोथरी से ज्यादा क्या है? और आप ख़ुद जो द्रवित, सूक्ष्म, संवेदनशील साहित्य रच रहे हैं, वह समय को देखते हुए भाषा व शब्दकोष की होशियारी दिखाने से ज्यादा क्या है?
यक़ीन मानिये, इस वक़्त मुझे सामाजिक-साहित्यिक दुनिया के कई चेहरे याद आ रहे हैं जो निजी ज़िन्दगी में पैतृक संपत्ति पर ठाठ के चलते आज सामाजिक जीवन में भी स्त्री-दलित विमर्श पर क्रांतिकारी तजवीजें दे रहे हैं, वे तसलीमा नसरीन को सुरक्षा न दे पाने के लिए भारत सरकार को भी खरी-खरी सुनाते हैं और दलितों के उत्थान के बजाय पार्कों के निर्माण के लिए मायावती को भी आड़े हाथों लेते हैं. पर उनके निजी जीवन में झांकते ही पता चल जायेगा कि जनाब बहनों को केवल दहेज-भात-नेग में टरकाने में यक़ीन रखते हैं. ऐसे सामाजिक चिंतकों के जीवन में न्याय और बराबरी के आदर्शों की जाँच-पड़ताल का समय आ गया है.
महिला-सबलीकरण की मुहिम को संसद के साथ-साथ पीहर में स्थापित करने की ज़रूरत है. और निश्चित रूप से इसमें पुरुष ही कुछ कर सकते हैं. औरतें तो बस उनके ज़मीर को जगाने की कोशिश ही कर सकती हैं. इसलिए महिला-सशक्तिकरण पर अगली बार जब विमर्श करें तो यहीं से शुरू करें कि ख़ुद अपने परिवार-ख़ानदान में सबसे पहले जायदाद में भागीदारी के कागज़ तैयार करवाएं, फिर इस मुहिम को रिश्ते-नाते, पड़ोस-मुहल्ले तक पहुंचाएं.
जिस दिन बेटियां भी बेटों की तरह मजबूत ज़मीन पर खड़ी होंगी, दुनिया हिला देंगी. ( प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ' हँस' के जनवरी 2011 अंक से साभार )