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Sunday, February 13, 2011


अल्पसंख्यकवाद की फफूंद छट रही है! 

-- शीबा असलम फ़हमी

"हिन्दुस्तानी जम्हूरियत, संविधान, सियासत, सरकारी मशीनरी, पॉलिसी साज़ी पर सख्त हमलावर रहनेवाले उर्दू अख़बार ख़ुद अपने समाज की दलदल को नज़रंदाज़ करते रहे हैं . मुस्लिम समाज की अंदरूनी ग़ैर-बराबरी, मर्दवादी और औरत मुख़ालिफ़ हरकतों, अतार्किक मज़हब परस्ती, ज़ात-पात की रवादारी, मज़हबी कयादत की ख़ुद-परस्ती, भ्रष्टाचार जैसे मामलों पर ये अख़बार हमेशा ही नरमी बरतते रहे. लेकिन जो समाज अपने गिरेबान में कभी नहीं झांकता और सिर्फ़ दूसरों को ही अपने हालात का ज़िम्मेदार मानता है उसका इलाज नहीं किया जा सकता. अपने पाठकों को सही दिशा ना दिखा कर ये उस चक्रव्यूह का हिस्सा बन गए जिसमें मुल्ला-मीडिया-मुस्लिम सियासी नेतृत्व की तिगड़ी मआशी और ज़हनी दिवालियापन पनपा रही थी"
किसी अर्थशास्त्री का बयान है की 'पूंजीवादी शोषण का शिकार होना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है परन्तु इससे भी ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है उसके द्वारा नज़रंदाज़ कर दिया जाना'. यानी की पूंजीवादी बाज़ारतंत्र जैसी 'पत्थर से पानी निचोडनेवाली' शोषक प्रक्रिया को भी अगर आप में कोई सम्भावना नहीं दिखाई देती तो आप में वाक़ई कुछ नहीं बचा है. हिंदुस्तान में मीडिया को लेकर इस वक़्त जो गर्मागर्म बहस चल रही है उसकी वजह घोर पूंजीवाद के इस दौर में मीडिया में कार्पोरेट संस्कृति, और मीडिया का ख़ुद कार्पोरेट बन जाना है. ज़ाहिर है जनमानस के बीच 'सरोकार', 'मूल्यों', 'जनहित', 'राष्ट्रनिर्माण' और 'लोकतंत्र के सुतून' जैसे शब्दों से जुड़े पेशे में, ये बहस इसलिए नहीं गर्माई है की ये कोई बड़ी अच्छी घटना मानी जा रही है, यक़ीनन आज इसे बेबसी के साथ ही विश्लेषण में शामिल किया जा रहा है. आज अंग्रेज़ी और वेर्नाकुलर मीडिया पर कार्पोरेट शब्द एक कोड़े की तरह पड़ रहा है.
 ऐसे में मैं समयांतर के पाठकों को भारतीय मीडिया के उस हिस्से से मिलवाना चाहती हूँ जो अपने वजूद को बचाने के लिए कार्पोरेट पूँजी को बड़ी आस भरी नज़रों से देख रहा है, क्यूंकि कोर्पोरेट की बुराइयाँ, सीमाएं, और ज़रूरी तक़ाज़ों की ज़द में आने से परहेज़ तो बाद की बात है, इस वक़्त सवाल ये है की ज़िन्दा कैसे रहा जाए? और अगर कोर्पोरेट पूँजी ना आ गई होती तो क्या होता? मैं बात कर रही हूँ हिंदुस्तान में उर्दू-अखबारात के हाल पर.
उर्दू ज़बान की फ़लाह के लिए जो सरकारी-ग़ैर सरकारी इदारे काम कर रहे हैं उनकी महफिलों, सेमिनारों में उर्दूदां अवाम की गिनती 20 करोड़ बताई जाती है. जिस पर ताज्जुब नहीं. और ये भी कि कालांतर में इसे पढ़नेवाले लगभग सभी मुसलमान हैं. इतने बड़े जनसमूह तक पहुँच रखनेवाले 'ज़रिये' को बाज़ार ने क्यों नहीं गर्दाना?
सियासी वजूहात (लसानी नस्लकुशी) अपनी जगह लेकिन इसके बावजूद 20 करोड़ की तादाद कम नहीं होती, और उर्दू के साथ तो यह भी है की 70 की दहाई से ही यह एक इंटरनेशनल ज़बान के तौर पर अपनी जगह बना चुकी है. जिसे कुछ समाजशास्त्री पैन-इस्लामिज़्म से जोड़े बिना नहीं देख सकते. आज ग्लोबलायज़ेशन के दौर में जब वस्तुएं-उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मार्केट किये जाते हैं, उर्दूदां अवाम की तादाद बहुत ही प्रभावशाली आंकड़े बनाती है. इसके बावजूद उर्दू मीडिया में ख़ास कर उर्दू अख़बार बेपनाह पस्त्हाली का शिकार क्यों रहे ये जानना ज़रूरी है.

पिछली कुछ दहाइयों से भारतीय उर्दू अख़बार कुछ ऐसी नोइयत से दो चार रहे जिसमे वो ऐसे भाषाई समूह की नुमायन्दगी कर रहे थे जो की अक्सर दूसरी ज़बानों में शिक्षित नहीं थे. यानी की वो मुसलमान जो की सिर्फ़ हुरूफ़ या अक्षर ज्ञान से वाकिफ़ हैं और जिन्हें बहुत उम्दा तालीम नहीं मिल सकी वह भी उर्दू अख़बार तो पढ़ ही रहा था. इसके अलावा बहुत से ऐसे पाठक उर्दू अख़बारों को मिले जो की मदरसों की पैदावार थे और हिंदी और अंग्रेज़ी में  बहुत सहज नहीं महसूस करते थे. कुल मिला कर उर्दू पाठकों का बहुत बड़ा तबक़ा उनका रहा है जो की आर्थिक रूप से मज़बूत नहीं थे और शैक्षिक रूप से मात्र उर्दू शनास काहे जा सकते हैं. लेकिन इसके बावजूद ये एक उपभोक्ता वर्ग तो था ही, जो साबुन, तेल, मंजन, आटा, नमक, मसाले, कपडे, जूते, चप्पल, टी वी, फ्रिज, मशीन जैसी उपभोक्ता वस्तुओं का इस्तेमाल तो कर ही रहा था. फिर ऐसा क्यों हुआ की बीस करोड़ उपभोक्ता को नज़रंदाज़ करके बाज़ार आगे बढ़ गया? इस ख़ास सूरतेहाल को समझने के लिए हमें उस सियासी पसेमंज़र पर नज़र डालनी होगी जो आज़ादी के साथ ही शुरू हुआ.

इसमें शायद ही किसी समाजशास्त्री को कोई ना-इत्तेफ़ाकी हो की पाकिस्तान के वजूद ने हिन्दुस्तानी उर्दू के वजूद पर ही सवाल खड़ा कर दिया. आज़ादी के बाद से ही सेकुलर प्राइमरी स्कूलों से उर्दू को रवाना कर दिया गया, जिसका नतीजा यह निकला की स्कूलों से ग़ायब हुई उर्दू सिर्फ़ इस्लामी मदरसों में बची रह गई. एक 'फंक्शनल लैंगुएज' के तौर पर उर्दू के वजूद पर यह जानलेवा साबित हुआ, क्यूंकि, उर्दूदां तबक़े के सामने अपनी औलादों को इस ज़बान से आरास्तां करने का एक ही तरीक़ा बचा की वो लाज़मी तौर पर इस्लामी मदरसे में भेजकर अपने बच्चों को उर्दू सीखाएं. हिंदुस्तान के सबसे बड़े ख़ित्ते की उर्दुदां अवाम को ज़बान के ज़रिये इस तरह कॉर्नर किया गया की उसके सेकुलर क्रीडेनशिअल्स सवालों के घेरे में आ गए (यहाँ मैं हिन्दुस्तानी मदरसों को फ़िरकापरस्ती से नहीं लेकिन हाँ आख़िरतपरस्ती से जरूर जोड़ रही हूँ). दूसरी तरफ़ यह क्राइसिस भी पैदा हो गया कि या तो बच्चे को डॉक्टर-इंजीनयर  बना लो या अपनी ज़बान पढ़ा लो. ख़ैर यह मौज़ूं एक अलग लेख में उठाए जाने चाहिए की किस तरह एक तरफ़ फ़ौज-अदालत-समाजयात और दूसरी तरफ़ इंक़िलाब-बग़ावत-आज़ादी-इश्क़ और सूफ़ियों की बानी यानी 'उर्दू ज़बान' के मुहाफ़िज़ देओबंदी-बरेलवी मदरसे बना दिये गए, जहाँ उन्हें हिंदुस्तानियत से लबरेज़ उर्दू की जगह अरबी-ज़दा दीनी डिस्कोर्स की ज़बान रटाई गई जो की समाजयात, साइंस, हिसाब, और ज़बान में दीनी हवालों से पुर थी और जिसमे मीर और ग़ालिब का अज़ीम उर्दू अदब, जो ख़ालिस सेकुलर अदब था, वह नदारद रहा.
देखिये, उर्दू ज़बान का मामला 20 करोड़ अवाम का मामला है, जिसे 'उर्दू अदब प्रेमियों' के मसले से ना जोड़ा जाए जो की कितना भी हौसला-अफ़ज़ा क्यों ना हो लेकिन बहरहाल एक छोटी सी अदब-प्रेमियों कि तादाद का मामला है, (जिनके लिए बाज़ार/इन्टरनेट ने देवनागरी और रोमन में भी उर्दू-अदब मुहैय्या करवा ही रखा है. उनकी उर्दू स्क्रिप्ट ना सीखने की काहिली की वजह से 20 करोड़ उर्दुदां लोगों की स्क्रिप्ट ख़त्म नहीं की जा सकती).
उर्दू ज़बान के हालात यहाँ तक बिगड़े की कुछ आतंकवादी वारदातों  में उर्दू में रुक्क़े बरामद बताए गए और फिर ज़बान को मुल्ज़िमों की विचारधारा से जोड़ कर इसे आतंकवादियों की कोड-भाषा तक साबित किया गया. जो ज़बान हिंदुस्तान में जन्मी-पली-बढ़ी और परवान चढ़ी वो किस आसानी से हिंदुस्तान दुश्मनों की खिदमतगार साबित कर दी गई, लेकिन किसी ने इस पर कुछ नहीं कहा की आख़िर उर्दू को तिरस्कृत किसने किया? किसने इस खांटी हिन्दुस्तानी ज़बान को  धार्मिक विद्वेष और सियासत के चलते ठुकरा दिया? तो लगातार उर्दू के देश-प्रेम को सवालों के घेरे में रखने से दो बातें हुईं की तक़सीम का इलज़ाम झेल रहा मुस्लिम उर्दुदां तबक़ा मसलहतन ख़ामोश हो गया और ग़ैर मुस्लिम उर्दुदां तबक़े को समझ में आ गया की वक़्त तो अब हिंदी का है लिहाज़ा 'मरी बछिया' को ढोने में क्या फ़ायदा? (हाँ गाहे-बगाहे उर्दू शायरी का सटीक इस्तेमाल ना नेहरुवाले भूले ना आज़ाद्वाले).
जहाँ तक उर्दू अदब का सवाल है तो हिन्दुस्तानी सरकार की इस पुर-तास्सुब हरकत ने उन उर्दू-प्रेमी ग़ैर-मुस्लिमों से भी उर्दू सीखने का मौक़ा और हिम्मत छीन ली जो ज़बान के मामले में सेहतमंद सोच रखते थे कि ज़बान तो बहरहाल एक ज़रिया है ख़यालात के तबादले का, फैलाव का, ना की किसी ख़ास दीन-मज़हब-पंथ-गुट की बपौती. और उर्दू अदब से इश्क़ करनेवाले मुसलमान और हिन्दू दोनों ही बेचारे यतीम हो गए, क्यूंकि मदरसों में उनके लिए कुछ था नहीं,और स्कूलों में उनकी उर्दू थी नहीं, तो वह कहां जाते? हाँ, एक अजब-ग़ज़ब इंतज़ाम ज़रूर रहा हमेशा, वो ये की आला तालीम के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज़रूर उर्दू अदब एक 'विषय' के तौर पर जारी रहा. तालीम के घामड़ पालिसी-साज़ों को पता नहीं कैसे ये यक़ीन था की दीनी मदरसों के फ़ारिग तालिबेइल्म अचानक मीर, सौदा, ग़ालिब, फ़ैज़, साहिर, जोश वगैरा के आशिक हो जाएँगे. लेकिन हुआ ये की इस्लाम या दीन की बाक़ायदा आला तालीम हासिल करने के लिए 'इस्लामिक स्टडीज़' के शोबे तो बहुत बाद की कहानी हैं, पहले तो मदरसों वालों को सिर्फ़ और सिर्फ़ 'शोबा-ए-उर्दू अदब' से ही गुज़ारा करना था.
ख़ैर! कहने का मक़सद यह कि उर्दू कि नई पौध सेकुलर स्कूलों से नहीं, बल्कि दीनी-मज़हबी मदरसों से निकलने लगी, जिसके नज़रिए और डिस्कोर्स दोनों ही 8 -9 साल कि दीनी-मदरसे की तालीम द्वारा एक ख़ास सिम्त में रवां-दवां कर दिए गए थे. इन्ही लोगों ने आगे जा कर मुख्तलिफ़ यूनीवरसिटी के उर्दू डिपार्टमेंटों को आबाद किया. (हालाँकि कुछ तादाद उन तुलबा कि भी रही जो किसी तरह अपने वालदैन या माहौल की बदौलत बिना मदरसे गए कुछ बुनियादी उर्दू सीख कर आ गए, इसमें भी घरेलू दीनी-तालीम का बड़ा हाथ रहा, ख़ास कर लड़कियों के हवाले से ये बात और भी सटीक है.) कुल मिला कर आप समझ गए होंगे की अब, उर्दू में बी ए, एम ए, एम फ़िल, और पी एच डी जैसी डिग्रियों से लैस ये नौजवान, अक्सर किस बैक ग्राउंड से आ रहे हैं.
अब आइये उर्दू अख़बारों के हाल पर जो इस लेख का असल मौज़ूं है. हिंदुस्तान के उर्दू अख़बारों में इस वक़्त ज़्यादातर मुस्लिम सहाफ़ी मदरसे के बैक ग्राउंड से ही हैं. उनमे से कुछ ने सहाफ़त का कोर्स किया है, कुछ ने वो भी नहीं किया. एक तरफ़ हिन्दुस्तानी समाज में हिंदुत्वा फिरक़ावारियत का बढ़ना, रोज़ रोज़ के दंगे-फ़साद, पुलिस/पी ए सी के ज़ुल्म, बाबरी मस्जिद की शहादत, और गुजरात में मुस्लिम नस्लकुशी के फ़ौरन बाद के दौर में,  मदरसा बैक ग्राउंड से आए सहाफ़ियों ने जिस फिरक़ावारियत से रंगे हालात में सहाफ़त शुरू की उसके लिए तो समाजयात के माहिरीन की ज़रुरत थी ना की आख़िरत की फ़िक्र में इस दुनिया में वक़्त काटते मज़हबी आलिम की? लिहाज़ा उर्दू सहाफ़त पर अक्सर मज़हबी कयादत और तंज़ीमों का दौर हावी होता चला गया. सरकारी तास्सुब पर, आर एस एस की घिनौनी साज़िशों पर, तथाकथित इस्लामी दहशतगर्दी के फ़ोबिया पर, मुसलमानों की तालीमी-मआशी पस्त'हाली पर चीख़ती सुर्ख़ियों का एक लम्बा दौर रहा उर्दू सहाफ़त में. कौम की जिस पस्त'हाली पर आंसू बहाए जा रहे थे उससे उबरने के लिए सियासी-समाजी माहिरीन की ज़रुरत उस वक़्त शिददत से पेश आई और सदी की आखरी दहाई से इनका दख़ल  होने भी लगा.
उर्दू अख़बार के मालिकान जो की अक्सर एडिटर भी होते हैं उन्होंने भी सियासी-समाजी पस्त'हाली को कैश कर उर्दू रीडरशिप को बढ़ाने की कोशिश की जबकि बीसवीं सदी के शुरूआती दौर में ऐसे उर्दू अख़बारों की लम्बी फ़ेहरिस्त है जो बहोत सेहतमंद और प्रगतिशील नज़रियों से सहाफ़त कर रहे थे. उर्दू अख़बारों में फिरक़ावारियत और घेट्टो मानसिकता आसान कामयाबी की तलाश का भी नतीजा रही. उर्दू अख़बारों में रीडरशिप बढ़ाने की होड़ ने अपने रीडर का बड़ा नुकसान किया. एक ऐसा शख्स जो तालीमी तौर से कमज़ोर था, जिसकी सोच को सेहतमंद और प्रोग्रेसिव बनाने के दूसरे सभी तरीक़े उसकी ज़द से छूट गए थे, पढ़ने के नाम पर वह सस्ते उर्दू अख़बार और रिसालों से ही जुड़ा रह गया था, ऐसे शख्स की सेहतमंद तरबियत उर्दू अखब़ार कर सकते थे, की अपने यहाँ प्रोग्रेसिव और इन्क्लुसिव सामग्री परोस कर काफ़ी हद तक नज़रयाती और क़ौमी समझ में सुधार ला सकते थे. अपने पाठक के सामने एक प्रोग्रेसिव, दूसरे कल्चर की अच्छाइयों को अपनानेवाला, अपने समाज के मज़लूमों (औरतें, अर्ज़ाल, अज्लाफ़, पसमांदा) की बात उठाने वाला और अल्हाय्दगी-पसंद रवैयों पर रोक लगानेवाला लेखन पेश कर के बेहतर शहरी तरबियत दी जानी चाहिए थी. लेकिन कुछ दौर ऐसा था, कुछ अख़बार मालिकों की समझ ऐसी थी की उर्दू अख़बार अल्पसंख्यकवाद की ज़हनियत को ही बेचनेलगे और उनका लहजा एक नाराज़, चिढ़चिढ़े, शिकायती और पस्त ज़हेनवाले इंसान का लगने लगा. हिन्दुस्तानी जम्हूरियत, आईन, सियासत, सरकारी मशीनरी, पॉलिसी साज़ी पर सख्त हमलावर रहनेवाले ये अख़बार ख़ुद अपने समाज की दलदल को नज़रंदाज़ करते रहे. मुस्लिम समाज की अंदरूनी ग़ैर-बराबरी, मर्दवादी और औरत मुख़ालिफ़ हरकतों, अतार्किक मज़हब परस्ती, ज़ात-पात की रवादारी, मज़हबी कयादत की ख़ुद-परस्ती, भ्रष्टाचार जैसे मामलों पर ये अख़बार हमेशा ही नरमी बरतते रहे. लेकिन जो समाज अपने गिरेबान में कभी नहीं झांकता और सिर्फ़ दूसरों को ही अपने हालात का ज़िम्मेदार मानता है उसका इलाज नहीं किया जा सकता. अपने पाठकों को सही दिशा ना दिखा कर ये उस चक्रव्यूह का हिस्सा बन गए जिसमें मुल्ला-मीडिया-मुस्लिम सियासी नेतृत्व की तिगड़ी मआशी और ज़हनी दिवालियापन पनपा रही थी. इस गठजोड़ से वही तबक़ा नुकसान में रहा जो की कम हैसियत और कम पढ़ा-लिखा था, मतलब ये की जिसे सबसे ज़्यादा रौशनी की ज़रुरत थी उसी को अँधेरी भूल-भुलैयां में उलझाया जा रहा था जबकि इनके हैसियतमंद मुसलमान भाई-बंधू सेकुलर तालीम हासिल कर डॉक्टर, इंजीनियर, अफ़सर बन कर सामान्य ज़िन्दिगी जी रहे थे.
  हाल में पड़ोसी मुल्क पकिस्तान में कुफ़्र क़ानून को लेकर जो हालात चल रहे हैं और ख़ास कर शहीद गवर्नर सलमान तासीर के क़त्ल के बाद से, उन कानूनों को लेकर पूरे उपमहाद्वीप में जो बहेस छिड़ी उस में भी देखने में आया की सलमान तासीर के क़त्ल की मज़म्मत तो उर्दू अख़बारों ने की लेकिन इन काले कानूनों पर, जो सिर्फ़ अपने कमज़ोरों को औक़ात में रखने के काम लाए जा रहे हैं, पर सही सिम्त में बात नहीं की गई. कुछ अख़बार तो सलमान तासीर को  ग़ैर-ज़िम्मेदाराना सियासत और कानूनी मामले में दखलंदाज़ी  का कुसूरवार भी ठहरा रहे थे. इन्हें लग रहा था की क़त्ल के गुनाह की निशानदेही करना ही काफ़ी है. जबकि असली मामला तो ये है की मुस्लिम समाज अपने अल्पसंख्यकों के साथ कैसा सुलूक करते हैं इस पर बात होनी चाहिए थी. एक पड़ोसी मुस्लिम मुल्क में लगातार इसाई, हिन्दू, पारसी, क़ाद्यानी और शिया लोगों के साथ ताक़त का खेल खेला जा रहा है. ख़ुद हिंदुस्तान में हर मौक़े पर सियासत और समाज को क़ानून की बराबरी, क़ानून का राज, हक़ और इंसाफ़ की चिंघाडती हुई सुर्खियाँ और तहरीर लगाने वाले उर्दू अख़बार पाकिस्तान के खतरनाक काले क़ानून पर साफ़ और खुल कर बात नहीं कर रहे. जबकि हिंदुस्तान का मुस्लिम बुद्धिजीवी समाज खुल कर इनकी मुखाल्फ़त कर रहा है. लेकिन अख़बार इसलिए साफ़ बात नहीं कह रहे की उन्हें तो अपनी उसी रीडरशिप का भला बने रहना है जो इनकी ख़ास शैली की आदि है. इन सब हालात के मद्देनज़र कॉर्पोरेट दुनिया का इस तरफ़ ध्यान देना उम्मीद की किरण दिखाता है की मज़हबी ज़हनियत के बजाय उर्दू सहाफ़त एक प्रोफ़ेशनल महारत और नज़रिए से होने लगे तो उन पीछे ले जाने वाले रुझानों से निजात मिले जिनसे सिर्फ़ मज़लूमियत और मिस्कीनियत पनपती है. मैं इस पूरे विमर्श से उन चंद-एक उर्दू अख़बारों के नाम अलग रखती हूँ जिन्होंने हमेशा एक सेहतमंद सोच ही पेश की, ख़ास कर दक्षिण भारत, मुंबई से निकलनेवाले और दिल्ली में ' डेली सहाफ़त' जैसे अख़बार जो ख़ुद को इन बिमारियों से बचा कर रख सके हैं.
 हम जानते हैं की इस्लामी-दीनी तालीम में जिस डिस्कोर्स में बात होती है वो इस दुनिया के बजाय मरने के बाद की, यानी आख़िरत की दुनिया को सँवारने में ज़्यादा दिलचस्पी रखता है, और इसके लिए वह ना सिर्फ़ अपनी ज़िन्दिगी बे-रंग किये रहता है बल्कि किसी और की ज़िन्दिगी को भी बे-रंग करना अपना मज़हबी फ़र्ज़ समझता है. ऐसी तालीमयाफ़्ता जमात भला मार्केट और कस्टमर के रिश्ते पर लानत ही भेजेगी नाकी उसे अपनाने-रिझाने के तौर तरीक़े निकालेगी. वह तो इस पर फ़ख्र करेगी की चाहें जो हो जाए हमने मदरसों में मशरिकी लानत यानी पूँजी को घुसने नहीं दिया और यही हम उर्दू अख़बार में भी कर के दिखाएँगे. लेकिन मीडिया तो एक पेशा है और उन्ही शर्तों पर चलता है जिसे हम 'लागत को मुनाफे' में तब्दील होने के तौर पर जानते हैं. बाज़ार और पूंजीवाद की पैदा बहुत संजीदा विकृतियाँ है इसमें कोई शक नहीं, और इस पर भी ताजुब नहीं की किसी दिन यह पूँजी भी मज़हबी तंगनज़री और अल्पसंख्यकवाद को अपने लिए इस्तेमाल करने लगे. इसके लिए भी उर्दूवालों को होशियार रहना होगा क्यूंकि टी वी चैनलों में हिन्दू समाज के हवाले से ये अब आम बात है. लेकिन उर्दू मीडिया अभी उस चकाचौंध से दूर है, लिहाज़ा उसपर बात फिर कभी. लेकिन पेड-न्यूज़ की संस्कृति उर्दू मीडिया में पहले से ही रही है फ़र्क़ सिर्फ़ यह है की पेमेंट करनेवाले हाथ पूंजीपति के ना हो कर सामंती होते थे और उनकी साज़िशें भी सिर्फ़ कौम की अंदरूनी सियासत तक सीमित रही हैं.
इक्कीसवीं सदी की शुरुआत उर्दू सहाफ़त के लिए इस लिहाज़ से बेहतर रही है की अब उर्दू अखब़ार और उर्दू चैनल सिर्फ़ मुसलमान मालिकों का क्षेत्र नहीं है. ई टी वी उर्दू, ज़ी टी वी सलाम, आलमी सहारा, डी डी उर्दू, यू एन आई उर्दू जैसे चैनल और चौथी दुनिया जैसे अख़बार अब कहीं ग़नीमत मीडिया हैं जो उर्दुदां हलक़ों तक हर मौज़ूं, हर मसले और हर क्षेत्र की जानकारियां पहुंचा रहे हैं. इसमें सियासत के अलावा, समाजयात, पर्यावरण, अंतरिक्ष, इन्फोर्मशन टेक्नोलोजी, मनोरंजन जगत, सेहत और चिकित्सा, मनोविज्ञान, और दुनिया भर के मुख्तलिफ़ कल्चर से जुड़ी जानकारियां शामिल की जा रही  हैं. इन इदारों में लिखनेवालों की पहचान भी सिर्फ़ एक मज़हबी ग्रुप से ना हो कर हिंदुस्तान के बहुसंख्यक वर्ग से है.साथ ही अनुवाद, ट्रांसलिटरेशन , न्यूज़ एजेंसियों की खिदमात के ज़रिये अब बहुत विविधता दिखाई दे रही है उर्दू मीडिया में भी.
आज के दौर में मीडिया एक ज़रूरी ज़रिया है अवाम तक पहुँचने का. आज के समाज का इसके बिना काम नहीं चल सकता. उर्दू मीडिया में कॉर्पोरेट सेक्टर के आने से बेहतर हालात बने हैं, हालाँकि हर वक़्त चौक्कन्ना रहने की ज़रुरत है क्यूंकि कॉर्पोरेट पूँजी सिर्फ़ अपना भला देखती है, उसके कोई समाजी सरोकार नहीं होते, इसके बावजूद यह एक ज़रूरी दौर है जिसके आने के बाद ही इसके अगले चरण में दाख़िल हुआ जा सकता है. क्यूंकि जब पूरा देश एक कस्टमर (उपभोक्ता) के तौर पर 'केयर'  के मज़े ले रहा हो तो एक हिस्सा घिसट कर की सही उस का हिस्सा बन रहा है. जैसा की मार्क्स हमें बताता है की सामंतवाद की बेगार और ग़ुलामी से  से छुटकरा पाने  के लिए पूंजीवाद, जिसने मज़दूर की मेहनत के दाम लगाए, एक ज़रूरी मरहला है जिसके बाद ही आगे बढ़ा जा सकता है. उर्दू सहाफ़ियों को वक़्त पर और हक़ बराबर तन्ख्वाह मिलने लगे, एक कारिंदे के तौर पर उसके कुछ हक़ हों इदारे पर, वो इस नौकरी में दो वक़्त इज्ज़त की रोटी खा सके, मआशी दबाव में किसी मौलाना, किसी जमात/जमियत का पैरोकार ना बन कर सही रिपोर्टिंग कर सके तो कितना अच्छा हो. तो देर ही से सही लेकिन पूँजी की नागाहे-करम इस वक़्त उर्दू सहाफ़त को रास आ रही है और उसे सेहत बख्श रही है, जिस पर देर से अल्पसंख्यकवाद की फफूंद उगी हुई थी. लिहाज़ा हिन्दुस्तानी उर्दू सहाफ़त फ़िलहाल खुश है की पूँजी ने उसे किसी लायक़ तो समझा.
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Sheeba Aslam
Research Scholar (PhD),
Centre for Political Studies,
School of Social Sciences
Jawaharlal Nehru University,

4 comments:

  1. आपको पढ़ने के बाद मुझे हमेशा अपने-आप को Recollect करना पड़ता है, और जवाब देने के लिए तो सोचना भी पड़ता है! लेकिन जहाँ असहमति होती है, वहाँ मैं चुप होकर बैठ भी नही पाता. इस लेख पर भी मुझे कई आपत्तियां हैं . सबसे पहले तो यही कि क्या वाकई देश में उर्दू पढ़ने वालों की संख्या 20 करोड़ है ? जहाँ तक मेरी जानकारी है, देश में कुल मुस्लिम आबादी ही इतनी नही है. और कितने गैर-मुस्लिम उर्दू पढ़ते होंगे, इसका अंदाजा कोई मुश्किल काम नही! असल में यह आंकड़ा भी वैसे ही है जैसे हिंदी-अंग्रेजी के कथित बड़े अखबार अपनी प्रसार संख्या के बारे में रोज-ब-रोज फर्जी आंकड़ेबाज़ी पेश कर अपना धंधा चमकाने का खेल करते रहते हैं!
    ये सच है कि सरकारी प्रायमरी स्कूलों से उर्दू को ख़त्म करके एक बड़ी गलती की गयी. इससे ऐसा ही हुआ जैसे किसी बहती हुई नदी की धारा को जबरन किसी और दिशा में मोड़ दिया जाय! आज़ादी से पहले और ज़रा बाद तक भी उर्दू कामकाजी और रोजगार की भाषा थी क्योंकि सरकारी दफ्तरों में इसका प्रमुखता से इस्तेमाल होता था.इसे ख़त्म करके सरकार ने इसकी जड़ ही काट दी ! आपका यह कहना बिल्कुल सही है की फिर तो उर्दू सिर्फ़ मदरसों की मोहताज़ होकर रह गयी, और उनकी प्राथमिकतायें ही दूसरी रही हैं ! इस लेख को पढ़ने के बाद बेसाख्ता मुझे प्रशासनिक अधिकारी और दलित चिन्तक चंद्रभान प्रसाद द्वारा पिछले दिनों उत्तर-प्रदेश में बनवाया और सरकार द्वारा रोक दिया गया '' अंग्रेजी देवी का मंदिर'' याद आ गया, जिसके बारे में उनका कहना है कि ये वो देवी हैं जो रोजगार या नौकरी का प्रसाद दे सकती हैं! उर्दू से सरकार ने ही यह प्रसाद छीन लिया!
    मैं इस बात से सहमत नही कि चंद बददिमाग लोगों के पास से उर्दू में लिखे खुराफ़ाती और साजिश वाले रुक्कों की बरामदगी से उर्दू और इसके लिखने-पढ़ने वालों (जाहिर है कि सिर्फ़ मुसलमान !) को ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया! यह अतिश्योक्ति है! दुनिया की वह कौन सी जबान है जिसमे यह सब नही हो रहा है?
    आप समाजशास्त्री हैं और फेलो भी, इसलिए लेख का समाजशास्त्रीय पहलू काबिले-तारीफ़ है! इस पर अलग से बढ़िया और महत्त्वपूर्ण रिसर्च की जा सकती है कि कैसे मदरसों में पल रहे उर्दू के बचपन को आगे चलकर विश्वविद्यालयों से बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल करनी होती हैं और इस सरकारी साजिश से कैसे -'' वही तबक़ा नुकसान में रहा जो कि कम हैसियत और कम पढ़ा-लिखा था, मतलब ये कि जिसे सबसे ज़्यादा रौशनी की ज़रुरत थी उसी को अँधेरी भूल-भुलैया में उलझाया जा रहा था जबकि इनके हैसियतमंद मुसलमान भाई-बंधु सेकुलर तालीम हासिल कर डॉक्टर, इंजीनियर, अफ़सर बन कर सामान्य ज़िन्‍दगी जी रहे थे''
    एकाध मुद्दों पर मुझे खिसियाई हुई हंसी भी आई- जहाँ एक तरफ पत्रकारिता में घुस आये कार्पोरेट को लेकर इन दिनों पत्रकारीय-शुचिता और आदर्शों की रक्षा की बातें की जा रही हैं, और चिंताएं की जा रही हैं कि क्या अब पहले जैसी पत्रकारिता का अस्तित्व बचा भी रह पायेगा,वहीं आपकी यह उम्मीद कि उर्दू मीडिया की तरफ देर से ही सही, लेकिन अब बाज़ार की निगाह पहुंची है और इससे उसकी तरक्की और उस पर निर्भर लोगों का भला होगा, एक तरफ से हारी, लेकिन दूसरी तरफ जीतने की उम्मीद भरी लडाई का माहौल बनाता है! ये रस्साकशी तो है ही, देखना है कि जोर किसमे है!
    आपके तकरीबन सभी लेख Research की Synopsis सरीखे होते हैं, वे हमेशा ही जगह की तंगी के शिकार हो जाते हैं ! इस लेख में भी ऐसे कई मुद्दे हैं जिन्हें और Space की ज़रूरत थी लेकिन लेख की अपनी सीमाएं होती हैं.उर्दू अख़बारों से जिस खुली जेहनियत की उम्मीद आपने लगायी है, वह पूंजी के आ जाने मात्र से आ जाएगी, यह मानना थोड़ा कठिन है.तंग ज़हनियत हर जगह है,सिर्फ़ हिंदुस्तान और पाकिस्तान में ही नही.सिर्फ़ अखबार इसे कितना सुधार सकते हैं?
    बहरहाल, विचारों को झकझोरने वाले इस लेख के लिए आपको बधाई! 00

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  2. आलेख पढा । आपके विचार जाने । धन्यवाद

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  3. हिंदी भाषा के प्रोत्साहन के लिए इस ब्लॉग को बढ़ावा दे तथा इस लिंक पर क्लिक कर इस ब्लॉग को फोल्लो करे ! http://ajaychavda.blogspot.com/

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  4. आपने एक नज़रिए से इस पोस्ट को लिखा है. स्वागत है. उर्दू भाषियों और दलितों (OBC,SC,ST) की सही संख्या को कभी प्रोजेक्ट नहीं किया जाता. इसके सियासी कारण हैं. आपका ब्लॉग अच्छा लगा.MEGHnet

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