There was an error in this gadget

Sunday, March 8, 2015

http://epaper.prabhatkhabar.com/454080/RANCHI-City/City#page/13/2

हम बलात्कार विरोधी नहीं हैं !

-- शीबा असलम फ़हमी 
sheeba_atplus@yahoo.com

आख़िर क्या बात है की सिर्फ़ महिलाओं (पुरुष नहीं) की यौन-शुचिता को जीवन-मृत्यु का सवाल मानने वाले समाज में यौन-शुचिता भंग करनेवाले अपराध को समाज, पुलिस, क़ानून, अदालत, सज़ा ,फांसी, फिर नरक के भय पर आधारित-धर्म तक रोक नहीं पा रहा है? कोई तो वजह होगी?
मेरी समझ से दो वजहें हैं इसकी - 
1 ).  की हमें हर बलात्कार से असुविधा नहीं है, और जिन से असुविधा नहीं है उन पर कोई पब्लिक डिबेट है ही नही. मसलन दलित, आदिवासी, मुस्लमान और ईसाई महिलाओं के बलात्कार पर घनघोर चुप्पी चारों तरफ पसरी हुई है. 
2 ).  जिस बलात्कार से हमें आपत्ति है उसे भी हम पीड़ित को मज़बूत कर के नहीं रोकना चाहते बल्कि उसे रोकने के लिए भी हम मरदाना-प्रोटोकॉल यानि बाहुबल यानी 'पुलिस-पिता-भाई' के सुरक्षा-कवच से ही रोकना चाहते हैं. मतलब ये कि जैसे ही इस सुरक्षा-कवच की लक्ष्मण रेखा लांघी तो महिला ने ख़ुद ही इस अपराध को न्योता दिया! ये सिर्फ़ भ्रम है की भारतीय समाज महिलाओं पर होनेवाले यौन-अपराधों के प्रति संवेदनशील है/या हो गया है/या हमेशा से था। हाँ ये ज़रूर सही है कि सत्ताधारी पुरुष वर्ग बस 'अपने' समाज की महिलाओं को ऐसे हादसे का शिकार होते नहीं देखना चाहता. इसमें भी ऐसा नहीं है की वो बलात्कार की पीड़ा और पीड़ित के प्रति किसी संवेदनशीलता के चलते 'अपनी महिलाओं' को बचाना चाहता है, ना ! बात सिर्फ इतनी है की घर-परिवार के पुरुषों की इज़्ज़त का वास बहन-बेटी की योनि में माना है, हमारी महान संस्कृति ने. अतः अपनी इज़्ज़त के इस 'निवास' पर वो केवल अपना पहरा और मर्ज़ी मानता है, और इसीलिए उसने इसकी सुरक्षा का सारा दारोमदार, मर्दाने-बाहुबल पर झोंक दिया है. इस सत्ताधारी पुरुषवर्ग की 'इज़्ज़त' क्यूंकि उसकी बहन-बेटी की योनि में सिमटी हुई है इसलिए खुद बहन-बेटी भी अपने शरीर पर अपना अधिकार नहीं रखती है. अपना शरीर वो अपने मन-पसंद को नहीं दे सकती. अपना शरीर वो सिर्फ अपने 'पिता-भाई की पसंद' को ही दे सकती है. लेहाज़ा वास्तविकता ये है की बलात्कार की असली परिभाषा हमारे समाज में ये है की 'पिता-भाई की मर्ज़ी के बग़ैर जो शरीर भोगेगा वो बलात्कारी। लड़की की मर्ज़ी के बिना उसके शरीर को बाप-भाई की मर्ज़ी के सर्टिफिकेट से लैस मर्द 'पति' रूप में रौन्दता ही रहा है, जिसका समाज जश्न मनाता है. इसीलिए बाप-भाई महिला को ख़ुद सशक्त करने में अपना हक़ अदा नहीं करते, क्यूंकि अगर बेटी-बहन ख़ुद ही सशक्त हो गई तो अपनी मर्ज़ी से अपना फ़ैसला करने लगेगी, यानी वो 'हर प्रकार के बलात्कार' को रोकने में सक्षम हो जाएगी, यानी उसके शरीर में जो घर के मर्दों की 'इज़्ज़त' का स्थान है वो उसमे से बेदख़ल हो जाएंगे, इसलिए बजाय लड़की को सशक्त करने के वे केवल उस समय तक अपनी इज़्ज़त की पहरेदारी करते हैं जब ये मालिकाना हक़ वे अपने मर्ज़ी के अन्य पहरेदार (दामाद पढ़ें) के हवाले नहीं कर देते हैं. नया पहरेदार (पति पढ़ें) भी ज़िम्मेदारी ये सुनिश्चिंत कर के लेता है की लड़की उस से दबी रहे, शर्माए, चुनौती न दे, आज्ञाकारिणी रहे और अपने शरीर को मालिक के लिए आरक्षित रखने हेतु ख़ुद ही घर-घुसनी हो रहे. 
तो जनाब दूसरी कैटेगरी के जिस बलात्कार से हमें बड़ी असुविधा है क्यूंकि उसमे मर्द की अपनी 'इज़्ज़त' लुट जाती है उसे भी मर्दवादी तरीके से ही रोकने का रास्ता वे सुझाते हैं समाज को. हम सब जानते हैं की शारीरिक हमला करने से पहले हमलावर अपने शिकार को आँकता है, अपने से ज़यादा या अपने बराबर की हिम्मती, दृढ़, मुखर और मज़बूत दिखनेवाली महिला को पस्त करने का जोखिम उस लम्हा बलात्कारी नहीं ले सकेगा. लेकिन कोई भी महिला अचानक खतरे के सामने आते ही तो मुक़ाबला करने लायक हो नहीं जाती। 'ना' करने की, न माने तो प्रतिरोध करने की, और पछाड़ देने की मनःस्तिथि किसी भी इंसान के व्यक्तित्व में शुरुआत से ही डाली जा सकती है. 
जिन घरों में महिला बचपन से ही खान-पान, इलाज, देख-रेख, शिक्षा, आज़ादी में निकृष्ट रखी जाती है, पारिवारिक फैसलों से बेदखल, जायदाद से बेदख़ल और दोयम दर्जे की आदी हो जाती है, वो महिला ससुराल, पति के घर, ऑफिस-कार्यस्थल, सड़क और संस्थान सभी जगह एक कमज़ोर और आश्रित व्यक्तित्व के कारण हर सही-ग़लत बर्दाश्त करने को मजबूर होती है. महिला पिता के घर से ही आश्रित या सशक्त हो सकती है. लेकिन हमारी महान संस्कृति की दुखती रग है बेटी-बहन की शर्मगाह में परिवार की इज़्ज़त ! बेटियों के शरीर का इस्तेमाल बदला और रंजिश में, इसी महान दुखती-रग के कारण होता आया है. और इस व्यवस्था को चैलेंज करनेवाली महिलाओं को बलात्कार रुपी सज़ा इसी मानसिकता के तहत दी जाती है. सजा देने का स्थान सड़क से ले कर घर, मंदिर, हस्पताल कुछ भी हो सकता है. 
जिन लोगों ने १६ दिसंबर के बाद प्रदर्शन किये उन्होंने क्या अपनी बहन को असुरक्षा से निकलने का कोई प्रयास अपने घर में किया? हाँ एक काम किया की पाबन्दी बढ़ा दी, पहनने की, निकलने की, समय की, साथी की।
दिल्ली रेप कांड का मुजरिम मुकेश, उसके दोनों वकील, तहलका के स्टिंग में ख़ुफ़िया कैमरे  पर बोलने वाले थानाध्यक्ष, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री, साधू, बापू, बाबा, और सभ्य-समाज के श्री मुख से लेकर देश के प्रधानमंत्री (याद कीजिये की 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' योजना के उद्घाटन पर उन्होंने कहा था की जब बेटी पैदा हो तो 5 पेड़ लगाओ जिससे उसके दहेज़ का ख़र्च निकला जा सके) तक चीख़ - चीख़  के यही तो कह रहे हैं हम महिलाओं से, शायद हम ही सुन नहीं पा रही हैं की 'वापिस लौट जाओ घर के कोने में, वरना हम दुनिया से लौटा देंगे'. 

Published in Prabhat Khabar on 8th March 2015.